वाराणसी | धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक काशी एक बार फिर हिंदुत्व के विमर्श का प्रमुख केंद्र बनकर उभरी है। हिंदू समाज के प्रखर वक्ता और अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के संस्थापक प्रवीण तोगड़िया पांच दिवसीय प्रवास पर वाराणसी पहुंचे हैं। इस दौरान वे शहर के विभिन्न क्षेत्रों में लगातार बैठकों और संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदू समाज को संगठित करने का अभियान चला रहे हैं।
काशी प्रवास के क्रम में बुधवार को सिद्धगिरी बाग स्थित मुकुलारण्यम स्कूल के समीप देव दर्शन गेस्ट हाउस में एक विशेष बैठक आयोजित की गई, जिसमें हिंदू समाज के सैकड़ों लोग शामिल हुए। बैठक में डॉ. तोगड़िया ने हिंदू समाज की वर्तमान स्थिति, सामाजिक चुनौतियों, सांस्कृतिक अस्मिता और भविष्य की दिशा पर विस्तार से अपने विचार रखे।
बैठक के उपरांत मीडिया से बातचीत में डॉ. तोगड़िया ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“हिंदू अगर बंटेगा, तो कटेगा। आज सबसे बड़ी जरूरत है कि हिंदू समाज जाति, क्षेत्र, भाषा और राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर एकजुट हो। हिंदू समाज की एकता ही देश की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान की सबसे बड़ी ढाल है।”
उन्होंने कहा कि यदि हिंदू समाज संगठित नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपरा, संस्कृति और आस्था बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। डॉ. तोगड़िया ने युवाओं से विशेष रूप से आगे आने का आह्वान करते हुए कहा—
“युवा केवल नौकरी और करियर तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें। जागरूक और संगठित युवा ही मजबूत हिंदू समाज की नींव रख सकते हैं।”
डॉ. तोगड़िया ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदू समाज को केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सामाजिक एकजुटता, शिक्षा, सुरक्षा और संस्कृति संरक्षण जैसे मुद्दों पर भी संगठित प्रयास करने होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि काशी जैसी पावन नगरी से उठी आवाज पूरे देश में हिंदू चेतना को नई दिशा दे सकती है।
बैठक में उपस्थित लोगों ने डॉ. तोगड़िया के विचारों का समर्थन करते हुए हिंदू समाज की एकता और जागरूकता के लिए सक्रिय रूप से काम करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंत में “जय श्रीराम” के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा।सूत्रों के अनुसार, काशी में डॉ. प्रवीण तोगड़िया का यह प्रवास आने वाले दिनों में और बैठकों, संवाद कार्यक्रमों व संगठनों से संपर्क के साथ जारी रहेगा। इसे हिंदू समाज को संगठित करने और वैचारिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।









