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शिक्षक ज्ञान ही नहीं, संस्कार और चरित्र गढ़ने की जिम्मेदारी निभाएं : कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा

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वाराणसी। शिक्षक दिवस के अवसर पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने समस्त शिक्षक समुदाय को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि शिक्षक केवल ज्ञान प्रदान करने वाले नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में संस्कार, विवेक, अनुशासन और चरित्र का निर्माण करने वाले मार्गदर्शक हैं। उन्होंने आधुनिक शिक्षा को भारतीय आध्यात्मिक एवं शास्त्रीय ज्ञान-परंपरा से जोड़ने का आह्वान किया।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में उनके चित्र पर माल्यार्पण करते हुए कुलपति ने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना, परीक्षा और रोजगार तक सीमित नहीं रह सकता। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो विद्यार्थियों में विनम्रता, संवेदना, कर्तव्यबोध और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करे।

उन्होंने कहा कि “सा विद्या या विमुक्तये” का भाव भारतीय शिक्षा-दर्शन की मूल भावना को दर्शाता है। ऐसी विद्या, जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और संकीर्णता से मुक्त कर सत्य, विवेक और श्रेष्ठ आचरण की ओर ले जाए, वही वास्तविक शिक्षा है। इसी प्रकार “आचार्यदेवो भव” भारतीय गुरु-परंपरा में शिक्षक के गौरवपूर्ण स्थान को रेखांकित करता है।

कुलपति ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और तेजी से बदलते ज्ञान-विज्ञान के दौर में शिक्षक की भूमिका कम नहीं हुई है, बल्कि और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। तकनीक सूचनाएं उपलब्ध करा सकती है, लेकिन मानवीय संवेदना, जीवन-मूल्य, विवेक और चरित्र का निर्माण शिक्षक ही कर सकता है। इसलिए शिक्षक का तकनीकी रूप से दक्ष होने के साथ मानवीय एवं मूल्यनिष्ठ होना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा में शिक्षा केवल कक्षा तक सीमित नहीं थी। गुरु अपने आचरण से शिक्षा देता था और शिष्य उसे अपने जीवन में उतारता था। आज आवश्यकता है कि आधुनिक शिक्षण पद्धतियों के साथ इस परंपरा की मूल भावना का समन्वय किया जाए, ताकि ज्ञान के साथ संस्कार और कौशल के साथ चरित्र का निर्माण हो सके।

कुलपति ने शिक्षकों से स्वयं निरंतर सीखते और समय के अनुरूप अद्यतन होते रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक का व्यवहार, व्यक्तित्व और आचरण विद्यार्थियों के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए शिक्षक का जीवन स्वयं एक जीवंत पाठशाला होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक और तकनीकी प्रगति से पूरा नहीं होगा। इसके लिए ज्ञानवान, संस्कारित, चरित्रवान और संवेदनशील नागरिकों का निर्माण भी आवश्यक है। इस दायित्व के केंद्र में शिक्षक हैं। भारतीय ज्ञान-परंपरा की आध्यात्मिक चेतना और आधुनिक विज्ञान-तकनीक का समन्वय देश की शिक्षा को नई दिशा दे सकता है।

कुलपति ने गुरु को जीवन में प्रकाश फैलाने वाला दीप बताते हुए सभी आचार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। शिक्षक दिवस के अवसर पर वेद-वेदांग संकाय में भी आचार्यों के सम्मान के साथ कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस अवसर पर प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो. महेन्द्र पाण्डेय, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, प्रो. अमित कुमार शुक्ल, डॉ. मधुसूदन मिश्र सहित अन्य शिक्षक एवं लोग उपस्थित रहे।

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