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हृदय निर्मल होगा, तभी दिखेगा भगवान का प्रतिबिंब : राधारमणाचार्य

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चन्दौली। केशवपुर चांदपुर (रतनपुरवा) में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिन कथा व्यास पंडित राधारमणाचार्य ने भागवत महात्म्य का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान के प्रतिबिंब को देखने के लिए हृदय रूपी आईने को निर्मल करना जरूरी है। मन की शुद्धता और भक्ति के माध्यम से ही परमात्मा की अनुभूति संभव है।

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण समस्त वेदों का सार है। मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पुण्य जब उदय होते हैं, तभी उसे भागवत कथा के श्रवण का सौभाग्य मिलता है। कथा कोई साधारण धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को भक्ति, ज्ञान और सदाचार की दिशा देने वाली अमृतमयी साधना है।

कथा व्यास ने भागवत के प्रथम श्लोक “सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे, तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः” का उल्लेख करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप और महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भागवत में पहले भगवान को प्रणाम किया गया है, फिर उनके स्वरूप, स्वभाव और दिव्य लीलाओं का वर्णन आता है। जो व्यक्ति भागवत के मर्म को समझ लेता है, वह भगवान की महिमा को भी समझने लगता है।

उन्होंने राजा परीक्षित और भगवान श्रीशुकदेव की कथा का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि तक्षक के दंश से सात दिन में मृत्यु का श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित ने श्रीमद्भागवत का श्रवण किया। उन्होंने कहा कि भागवत कथा मनुष्य को सांसारिक मोह से ऊपर उठाकर ईश्वर भक्ति और आत्मचिंतन का मार्ग दिखाती है।

राधारमणाचार्य ने कहा कि कलियुग के मनुष्य के कल्याण की चिंता शास्त्रों में विशेष रूप से की गई है। इस युग में मनुष्य की आयु कम है और शास्त्रों का विस्तार बहुत अधिक है। ऐसे में सहज रूप से कल्याण का मार्ग श्रीमद्भागवत कथा को बताया गया है। कथा का श्रवण मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक चेतना और सद्विचारों का संचार करता है।

उन्होंने कहा कि व्यासजी ने भगवान की प्राप्ति के उद्देश्य से इस ग्रंथ की रचना की थी। बाद में इसे ‘श्रीमद्भागवत’ नाम मिला। ‘श्रीमद्’ शब्द में भी गहरा संदेश निहित है। धन-संपत्ति से उत्पन्न अहंकार को दूर करने के लिए भागवत का श्रवण मनुष्य को विनम्रता, भक्ति और आत्मबोध की ओर ले जाता है। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से श्रीमद्भागवत का श्रवण किया।

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