वाराणसी। थायराइड शरीर की महत्वपूर्ण ग्रंथियों में से एक है, जो शरीर के ऊर्जा-उपयोग, तापमान, हृदय, मस्तिष्क और मांसपेशियों सहित कई शारीरिक क्रियाओं को प्रभावित करने वाले हार्मोन बनाती है। थायराइड कम सक्रिय होने पर हाइपोथायरॉइडिज्म और अधिक सक्रिय होने पर हाइपरथायरॉइडिज्म की स्थिति हो सकती है। यह जानकारी डॉ. स्वाति तिवारी ने थायराइड रोग के कारण, लक्षण, बचाव और योग के संबंध में दी।
डॉ. तिवारी ने बताया कि हाइपोथायरॉइडिज्म में थकान, कमजोरी, वजन बढ़ना, ठंड अधिक लगना, कब्ज, त्वचा का रूखापन, बालों का झड़ना, एकाग्रता में कमी और अधिक सुस्ती जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, इन लक्षणों का कारण केवल थायराइड ही हो, यह जरूरी नहीं है। ऐसे में स्वयं निदान करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना आवश्यक है। सामान्यतः TSH और Free T4 जांच महत्वपूर्ण होती हैं।
उन्होंने बताया कि थायराइड की समस्या के पीछे ऑटोइम्यून बीमारी, आयोडीन की कमी या अधिकता, थायराइड की सर्जरी, रेडियोधर्मी आयोडीन उपचार, कुछ दवाओं का प्रभाव और पिट्यूटरी ग्रंथि से संबंधित समस्याएं कारण हो सकती हैं। वहीं तनाव, अनियमित दिनचर्या, कम नींद और असंतुलित आहार भी स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

डॉ. स्वाति तिवारी ने कहा कि थायराइड स्वास्थ्य के लिए ताजा, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन लेना चाहिए। अत्यधिक तला-भुना, मीठा और प्रसंस्कृत भोजन सीमित करने के साथ दालें, फलियां, सब्जियां, फल और उचित मात्रा में मेवे को आहार में शामिल किया जा सकता है। बिना चिकित्सकीय सलाह के आयोडीन की गोलियां या अत्यधिक आयोडीन वाले सप्लीमेंट लेने से बचना चाहिए।
उन्होंने नियमित दिनचर्या अपनाने, पर्याप्त नींद लेने और रोजाना उचित शारीरिक गतिविधि करने की सलाह दी। तनाव कम करने के लिए योग, प्राणायाम और ध्यान को भी जीवनशैली का हिस्सा बनाया जा सकता है।
डॉ. तिवारी के अनुसार, योग थायराइड प्रबंधन में सहायक जीवनशैली उपाय हो सकता है, लेकिन इसे थायराइड की दवा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। प्रशिक्षित योग शिक्षक की देखरेख में क्षमता के अनुसार सूर्य नमस्कार, भुजंगासन, सेतुबंधासन, मार्जरी-व्याघ्रासन, वज्रासन, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, ध्यान और शवासन का अभ्यास किया जा सकता है।
उन्होंने विशेष रूप से चेताया कि थायराइड की दवा स्वयं बंद नहीं करनी चाहिए। हाइपोथायरॉइडिज्म में लेवोथायरॉक्सिन सामान्य उपचार है और इसकी मात्रा चिकित्सक जांच रिपोर्ट व मरीज की स्थिति के अनुसार तय करते हैं। कैल्शियम, आयरन, भोजन और कुछ अन्य दवाएं इसके अवशोषण को प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए दवा चिकित्सकीय निर्देश के अनुसार ही लेनी चाहिए।
डॉ. तिवारी ने कहा कि किसी भी आयुर्वेदिक औषधि, काढ़े या सप्लीमेंट को चिकित्सकीय सलाह के बिना थायराइड की दवा के स्थान पर शुरू नहीं करना चाहिए। गर्भावस्था, हृदय रोग, बुजुर्ग अवस्था या अन्य दवाएं चल रही होने पर विशेष सावधानी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि लगातार थकान, वजन में असामान्य बदलाव, अत्यधिक ठंड लगना, कब्ज, धड़कन तेज होना, हाथ कांपना या गर्दन में सूजन जैसे लक्षण दिखाई दें तो चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। सही जांच, उचित उपचार, संतुलित आहार, योग और नियमित चिकित्सकीय निगरानी से थायराइड को बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।










