वाराणसी, 19 अगस्त। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में बुधवार को संस्कृत एवं अन्य प्राच्य विभाग तथा अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘वाग् वै ब्रह्म’ विषय पर भाषा अंतर्विषयी विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो. हरिराम मिश्र ने विशिष्ट वक्ता के रूप में भाषायी दर्शन, शब्द-तत्व और भाषा की विविधता पर विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ। संस्कृत विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. सीमा यादव तथा अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज धनकड़ ने प्रो. मिश्र का अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया।
प्रो. हरिराम मिश्र ने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा में शब्द को सृष्टि के मूल तत्व के रूप में देखा गया है। सभी अक्षर ब्रह्मस्वरूप हैं और चेतना ही वाक्य का आधार है। वैदिक मंत्रों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि शब्द के बिना किसी क्रिया की कल्पना संभव नहीं है। उन्होंने भाषा के विभिन्न रूपों, विशेषकर वैखरी एवं मध्यमा, के महत्व के साथ शब्द और अर्थ के संबंध पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि शब्द ही प्रतिभा, ज्ञान और कल्पना का आधार बनकर सृजन को जन्म देता है। वेद और वेदांग भारतीय ज्ञान परंपरा में भाषा की समझ के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भाषा के विकास में विभिन्न आचार्यों और समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समाज उन्हीं विचारों को आगे बढ़ाता है, जो उसके लिए उपयोगी एवं सार्थक होते हैं।
प्रो. मिश्र ने कहा कि भाषा के विकास और उससे जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए पारस्परिक संवाद बेहद आवश्यक है। प्रश्न और संवाद के माध्यम से ज्ञान को बेहतर ढंग से समझने के साथ ही सामूहिक रूप से समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने आचार्यों से निरंतर प्रश्न पूछने और शिक्षा-परंपरा को मजबूत बनाने का आह्वान किया।
अंत में अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज धनकड़ ने धन्यवाद ज्ञापित किया। संचालन प्रो. सीमा यादव ने किया। इस अवसर पर प्रो. निशा सिंह, प्रो. अनिता, डॉ. दीपक, डॉ. किरण सिंह, डॉ. रीना चटर्जी, डॉ. धीरेन्द्र कुमार पाण्डेय, डॉ. कुमुद पाण्डेय, डॉ. शमा मिश्र, डॉ. उपेंद्र पांडे सहित दोनों विभागों के शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।










