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तिरंगा भारत की आत्मा, शहीदों के सपनों का भारत बनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि : प्रो. बिहारी लाल शर्मा

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वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में 80वां स्वतंत्रता दिवस समारोह राष्ट्रभक्ति, गौरव और संकल्प के वातावरण में मनाया गया। विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक मुख्य भवन के समक्ष कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने ध्वजारोहण कर राष्ट्रध्वज को सलामी दी। इसके बाद सामूहिक राष्ट्रगान हुआ। समारोह को संबोधित करते हुए कुलपति ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उन असंख्य अमर शहीदों के त्याग, तपस्या, संघर्ष और बलिदान को स्मरण करने का पावन दिन है, जिनके कारण देश को स्वतंत्रता मिली।

कुलपति ने कहा कि “माँ भारती के लिए जो मर-मिटने का संकल्प हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने लिया था, उसे उन्होंने कभी कम नहीं होने दिया।” असंख्य बलिदानों और लंबे संघर्ष के बाद आज तिरंगा खुले आसमान में शान से लहरा रहा है। यह तिरंगा भारत के आन-बान-शान के साथ ही स्वतंत्रता सेनानियों के समर्पण और बलिदान का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज के संकल्प से लेकर 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने तक का सफर असंख्य बलिदानों से भरा रहा। भगत सिंह, लाला लाजपत राय, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक सहित असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों के त्याग ने स्वतंत्र भारत की नींव रखी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के साथ विभाजन की पीड़ा भी मिली, लेकिन तिरंगे के उन्मुक्त गगन में लहराने का गौरव भारत की आत्मा का अमर प्रतीक बन गया।

कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि “यह साधारण तिरंगा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, सांस्कृतिक निधि और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। यह भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के समर्पण की जीवंत स्मृति है।” उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ अपने बनाए संविधान और विधान के अनुरूप कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना है।

उन्होंने कहा कि भारत ऋषि परंपरा, पवित्र नदियों और महान ग्रंथों की भूमि है। विश्व में जहां अनेक सभ्यताएं उम्रदराज हो रही हैं, वहीं भारत युवा शक्ति के साथ विश्व में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे भारतीय संस्कृति, ज्ञान और राष्ट्रभावना को जीवन का आधार बनाएं।

 कुलपति ने कहा कि स्वतंत्रता हमारे पूर्वजों की अमूल्य विरासत है और इसकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का परम दायित्व है। आज आत्मावलोकन के साथ यह संकल्प लेने की आवश्यकता है कि हम ईमानदारी, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ विकसित, आत्मनिर्भर, समरस, संस्कारित और गौरवशाली भारत के निर्माण में योगदान देंगे। शहीदों के सपनों का भारत बनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

उन्होंने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में इस संस्था की भूमिका गौरवपूर्ण रही है। विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रहे चन्द्रशेखर आजाद ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने कहा कि 235 वर्षों से ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित कर रहा यह प्राच्यविद्या का प्रमुख केंद्र भारतीय संस्कृति और देववाणी संस्कृत के संरक्षण एवं प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

कुलपति ने शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों से कहा कि व्यक्ति जहां भी है, यदि वह अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करता है तो वही सच्चा देशभक्त है। परिसर को स्वच्छ रखना, अध्ययन-अध्यापन व्यवस्था को बेहतर बनाना तथा कार्यालयीय कार्यों को शुचिता, पारदर्शिता और समयबद्धता के साथ पूरा करना भी राष्ट्रसेवा है।

उन्होंने कहा कि काशी ज्ञान की राजधानी है और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय ज्ञान की उस प्राचीन धारा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। विश्वविद्यालय का दायित्व केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रभावना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है।

समारोह के प्रारंभ में कुलपति ने एनसीसी कैडेट्स की परेड का निरीक्षण किया। भारत माता के चित्र तथा महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। संगीत विभाग की ओर से कुलगीत एवं ध्वज वंदना प्रस्तुत की गई। इसके बाद कुलपति ने परिसर स्थित मां सरस्वती, डॉ. सम्पूर्णानंद तथा पंडित चन्द्रशेखर आजाद की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर नमन किया।

समारोह में कुलसचिव राकेश कुमार, परीक्षा नियंत्रक दिनेश कुमार, प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो. सुधाकर मिश्र, प्रो. हीरक कांत चक्रवर्ती, शैलेश कुमार मिश्र, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. राजनाथ, प्रो. अमित कुमार शुक्ल, प्रो. विजय कुमार पाण्डेय, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. विजेंद्र आर्य, डॉ. दुर्गेश पाठक, डॉ. नितिन आर्य सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ।

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