वाराणसी/जौनपुर। रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का ऐसा पावन पर्व है, जो केवल भाई-बहन के स्नेह और रक्षा के संकल्प तक सीमित नहीं है, बल्कि परस्पर विश्वास, कर्तव्यबोध, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और मानवीय संवेदना का व्यापक संदेश देता है। भारतीय परंपरा में रक्षा-सूत्र को मंगल, संरक्षण और लोककल्याण का प्रतीक माना गया है।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के जनसंपर्क अधिकारी शशीन्द्र मिश्र ने जौनपुर स्थित अपने गृह नगर में रक्षाबंधन पर्व के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि रक्षा-सूत्र केवल कलाई पर बांधा जाने वाला धागा नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, मर्यादा, कर्तव्य और संरक्षण के पवित्र संकल्प का प्रतीक है। यह पर्व हमें परिवार के साथ-साथ समाज, संस्कृति, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों का भी स्मरण कराता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ जैसी उदात्त भावनाओं पर आधारित है। रक्षाबंधन इन्हीं मूल्यों को व्यवहार में उतारने का अवसर प्रदान करता है। यह पर्व जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र और संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता तथा राष्ट्रीय एकात्मता को मजबूत करने की प्रेरणा देता है।

शशीन्द्र मिश्र ने कहा कि भारतीयता का वास्तविक अर्थ अपनी समृद्ध ज्ञान-परंपरा, संस्कृति, संस्कार, लोकमंगल की भावना और विविधता में एकता के मूल्यों को आत्मसात करना है। सच्ची राष्ट्रीयता वही है, जिसमें राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के सम्मान, सुरक्षा, अधिकार और गरिमा के प्रति संवेदनशीलता हो।
उन्होंने कहा कि एक स्वच्छ और समतामूलक समाज की स्थापना तभी संभव है, जब शोषण, भेदभाव, भ्रष्टाचार, अन्याय और सामाजिक विषमता के विरुद्ध सामूहिक चेतना विकसित हो तथा विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। सामाजिक न्याय के साथ समान अवसर, अधिकारों के साथ कर्तव्य और विकास के साथ मानवीय संवेदना का समन्वय आवश्यक है।
जनसंपर्क अधिकारी ने कहा कि रक्षाबंधन के अवसर पर समाज को नारी सम्मान, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, राष्ट्रीय एकता तथा वंचित और कमजोर वर्गों की सुरक्षा का संकल्प लेना चाहिए। यही इस पर्व की व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक सार्थकता है।
उन्होंने कहा कि रक्षा किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक दायित्व है। जब समाज में परस्पर विश्वास, सहयोग, सम्मान और संवेदना की भावना मजबूत होती है, तभी राष्ट्र सशक्त, समरस और समृद्ध बनता है।
शशीन्द्र मिश्र ने कहा कि रक्षाबंधन भारतीय ज्ञान-परंपरा की उस जीवन-दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक उत्तरदायित्व की भावना निरंतर विस्तारित होती है। आज आवश्यकता है कि प्रेम को संस्कार, रक्षा को दायित्व, समरसता को व्यवहार और राष्ट्रसेवा को जीवन का संकल्प बनाया जाए।
उन्होंने समस्त देशवासियों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कामना की कि यह पावन पर्व प्रत्येक परिवार में प्रेम, विश्वास, सौहार्द और सुख-समृद्धि का संचार करे तथा भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को नई शक्ति प्रदान करे।










