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फोर्स में बढ़ता तनाव गंभीर चुनौती, योग-आयुर्वेद से मानसिक स्वास्थ्य को मिले सहारा : डॉ. स्वाती तिवारी

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वाराणसी। सुरक्षा बलों के जवान और अधिकारी कठिन परिस्थितियों, लंबे ड्यूटी घंटे, अनियमित दिनचर्या, नींद की कमी, परिवार से दूरी और लगातार जिम्मेदारियों के बीच कार्य करते हैं। ऐसे में बढ़ता मानसिक तनाव अब केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि संगठनात्मक स्वास्थ्य और operational readiness से जुड़ी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। समय रहते तनाव के संकेतों को पहचानना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना बेहद जरूरी है। यह कहना है डॉ. स्वाती तिवारी का।

डॉ. तिवारी के अनुसार लगातार बना रहने वाला तनाव व्यक्ति की नींद, व्यवहार, निर्णय क्षमता, भावनात्मक स्थिति और पारिवारिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। चिड़चिड़ापन, बेचैनी, नींद में बदलाव, नकारात्मक विचार, काम में मन न लगना, सामाजिक दूरी, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, निराशा और स्वयं को दूसरों पर बोझ समझना इसके प्रमुख संकेत हो सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आत्मघाती विचारों को कमजोरी या मजाक समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। यदि कोई जवान यह कहता है कि ‘अब मुझसे नहीं हो रहा’, ‘जीने का कोई मतलब नहीं लगता’ या ‘मैं सबके लिए बोझ बन गया हूं’, तो उसकी बात गंभीरता से सुनी जानी चाहिए। व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक अलगाव, निराशा, मृत्यु या आत्महत्या की चर्चा अथवा महत्वपूर्ण वस्तुएं दूसरों को सौंपना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं।

 डॉ. स्वाती तिवारी ने कहा कि मानसिक परेशानी होना कमजोरी नहीं है और समय पर सहायता लेना भी कमजोरी का संकेत नहीं है। जिस प्रकार शारीरिक चोट या बीमारी में चिकित्सक की जरूरत होती है, उसी प्रकार मानसिक संकट में मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, मेडिकल अधिकारी अथवा प्रशिक्षित काउंसलर की सहायता लेना स्वास्थ्य सेवा का सामान्य हिस्सा है।

उन्होंने बताया कि आयुर्वेद शरीर और मन को एक-दूसरे से जुड़ा मानता है। संतुलित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, पौष्टिक भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और मानसिक विश्राम तनाव प्रबंधन में सहायक हो सकते हैं। ड्यूटी की परिस्थितियों के अनुरूप सोने-जागने, भोजन, व्यायाम, विश्राम और परिवार से संवाद के लिए संतुलित दिनचर्या अपनाना उपयोगी है।

 तनाव प्रबंधन में योग को उपयोगी सहायक साधन बताते हुए डॉ. तिवारी ने कहा कि ताड़ासन, भुजंगासन, वज्रासन, बालासन और शवासन जैसे सरल अभ्यास शरीर को विश्राम देने और मानसिक स्थिरता में मदद कर सकते हैं। नाड़ी शोधन, भ्रामरी तथा सहज धीमी श्वास के अभ्यास भी कुछ लोगों को मानसिक relaxation में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, आत्मघाती संकट या गंभीर मानसिक बीमारी की स्थिति में योग और प्राणायाम को अकेला उपचार नहीं माना जाना चाहिए।

उन्होंने फोर्स की यूनिटों में सप्ताह में कुछ समय ‘Mental Health & Wellness Session’ के लिए निर्धारित करने का सुझाव दिया। इसमें श्वास अभ्यास, योग, relaxation, stress-management education, peer interaction और जरूरतमंद कर्मियों को confidential counselling से जोड़ने की व्यवस्था की जा सकती है।

डॉ. तिवारी के अनुसार प्रत्येक जवान को एक भरोसेमंद साथी या ‘trusted buddy’ से जोड़ना उपयोगी पहल हो सकती है। साथी समय-समय पर सामान्य बातचीत के जरिए उसकी स्थिति समझ सके। इसका उद्देश्य निगरानी नहीं, बल्कि मानवीय सहयोग होना चाहिए। वहीं कमांड स्तर पर भी संवेदनशील संवाद की जरूरत है। वरिष्ठ अधिकारी जवान से केवल ड्यूटी की जानकारी लेने के बजाय यह भी पूछें कि वह व्यक्तिगत रूप से कैसा महसूस कर रहा है।

उन्होंने कहा कि परिवार भी मानसिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण सहारा है। नियमित फोन या वीडियो कॉल, खुला संवाद और कठिन परिस्थितियों में परिवार तथा यूनिट के बीच बेहतर समन्वय जवान को भावनात्मक मजबूती दे सकता है

डॉ. स्वाती तिवारी ने स्पष्ट किया कि यदि कोई जवान आत्महत्या के विचार व्यक्त करता है तो उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। उसकी बात शांतिपूर्वक सुननी चाहिए और डांटने, शर्मिंदा करने या उसे कमजोर कहने से बचना चाहिए। उसे तत्काल यूनिट की चिकित्सा व्यवस्था, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक अथवा मनोचिकित्सक से जोड़ना चाहिए। यदि तत्काल खतरा हो तो आपात चिकित्सा सहायता लेकर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेदिक औषधियां जैसे अश्वगंधा, ब्राह्मी या शंखपुष्पी कुछ परिस्थितियों में चिकित्सकीय सलाह से उपयोग की जा सकती हैं, लेकिन गंभीर अवसाद, आत्मघाती विचार, अत्यधिक चिंता अथवा गंभीर अनिद्रा में इन्हें स्वयं से लेना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय मूल्यांकन और आवश्यक evidence-based उपचार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

 डॉ. तिवारी ने कहा कि फोर्स में मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग, आयुर्वेदिक जीवनशैली, व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, परिवार का सहयोग, peer support, counselling और चिकित्सकीय देखभाल को एक समग्र मॉडल के रूप में अपनाने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि फोर्स में ऐसा वातावरण बनना चाहिए जहां जवान अपनी परेशानी खुलकर बता सके। दर्द छिपाना बहादुरी नहीं है और मदद मांगना कमजोरी नहीं है। समय पर सुनी गई बात, किया गया एक फोन, मिला हुआ एक साथी और उपलब्ध कराई गई चिकित्सा सहायता किसी की जिंदगी बचा सकती है।

उनका संदेश है—‘जवान की जिंदगी अनमोल है। उसकी चुप्पी को कमजोरी न समझें, उसकी परेशानी को सुनें, उसे अकेला न छोड़ें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद तक पहुंचाएं।’

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