चंदौली। भारत की पहचान केवल उसकी सीमाओं और सत्ता व्यवस्था से नहीं, बल्कि उसकी हजारों वर्ष पुरानी संत परंपरा, ऋषि संस्कृति और कृषि आधारित जीवन-दृष्टि से बनी है। यही भारत की आत्मिक शक्ति और वैश्विक प्रतिष्ठा का मूल आधार है। यह विचार अंतर्राष्ट्रीय सनातन धर्म के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं राष्ट्र जन अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. परशुराम सिंह ने विशेष भेंटवार्ता में व्यक्त किए।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत ने इतिहास में अनेक शासकों, राजनीतिक व्यवस्थाओं और सामाजिक परिवर्तनों का दौर देखा, लेकिन उसकी मूल सांस्कृतिक चेतना कभी समाप्त नहीं हुई। संत शक्ति, ऋषि परंपरा और कृषि संस्कृति ने सदैव राष्ट्र को भीतर से जोड़ने और उसकी पहचान को जीवंत रखने का काम किया है।
उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति आध्यात्मिक चिंतन, प्रकृति के साथ सामंजस्य और मानव कल्याण की जीवन-पद्धति में निहित है। आने वाली पीढ़ियां यदि इस मूल चेतना को समझकर आगे बढ़ेंगी तो भारत के सम्मान और वैश्विक प्रभाव को कोई शक्ति कमजोर नहीं कर सकती।

भारत और सनातन संस्कृति को विशाल वटवृक्ष की संज्ञा देते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि इसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत हैं कि समय के अनेक झंझावात भी इन्हें हिला नहीं सके। इतिहास में पतझड़ के दौर आए, लेकिन हर बार नई कोपलों के साथ सनातन संस्कृति और अधिक सशक्त होकर सामने आई।
उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक चेतना की यही शक्ति है कि हजारों वर्षों के उतार-चढ़ाव के बावजूद सनातन परंपरा आज भी प्रासंगिक है ।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारतीय जीवन-दर्शन में ऋषि और कृषि कभी एक-दूसरे से अलग नहीं रहे। ऋषियों ने प्रकृति, जल, वन, भूमि, औषधियों और जीव-जगत के साथ संतुलित जीवन का संदेश दिया, जबकि कृषि ने समाज को अन्न, आत्मनिर्भरता और स्थायित्व प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में भूमि को संपत्ति नहीं, ‘माता’ का दर्जा दिया गया। नदियों, पर्वतों, वनों, पशुओं और वृक्षों के प्रति श्रद्धा इसी व्यापक जीवन-दृष्टि का हिस्सा रही है। इसलिए सनातन संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
डॉ. परशुराम सिंह ने कहा कि भारत का वास्तविक गुरुत्व उसकी सत्ता में नहीं, बल्कि ज्ञान, अध्यात्म, संस्कृति, सह-अस्तित्व और सर्वकल्याण की भावना में है। यही वह शक्ति है जिसने भारत को सदियों तक विश्व के लिए ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का केंद्र बनाए रखा।
उन्होंने कहा कि सनातन जीवन-दर्शन किसी एक व्यक्ति, कालखंड या सत्ता की देन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित वह धारा है, जिसने समय के साथ अपने स्वरूप का विस्तार किया, लेकिन अपनी मूल चेतना को कभी नहीं छोड़ा।
डॉ. सिंह ने कहा कि आज विश्व अनेक संकटों और चुनौतियों से गुजर रहा है। ऐसे समय में भारत की प्राचीन अवधारणा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और सर्वकल्याण की भावना मानवता को नई दिशा दे सकती है। भारत अपनी संत परंपरा, ऋषि चिंतन और प्रकृति आधारित जीवन-पद्धति से जुड़कर विश्व शांति और समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करना केवल अतीत को संरक्षित करना नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित करना भी है। संतों का मार्गदर्शन, ऋषियों का चिंतन, किसानों का परिश्रम और प्रकृति के प्रति सम्मान राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बनना चाहिए।
डॉ. सिंह ने विश्वास व्यक्त किया कि संत शक्ति, ऋषि चिंतन, कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान जब तक भारतीय जीवन में जीवित रहेंगे, तब तक भारत की आत्मा और उसका वैश्विक गुरुत्व भी अटल रहेगा। अपनी सनातन सांस्कृतिक चेतना के बल पर भारत आने वाले समय में विश्व शांति, मानव कल्याण और समृद्धि का प्रभावी नेतृत्व कर सकता है।










