वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार स्थित भोजशाला परिसर को संस्कृत शिक्षण का केन्द्र एवं हिन्दू मंदिर मानते हुए दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने इसे भारतीय सनातन संस्कृति, ऐतिहासिक प्रमाणों तथा सत्य की विजय बताया।
कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि भोजशाला केवल एक स्थापत्य संरचना नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा, सांस्कृतिक चेतना तथा देवी सरस्वती की आराधना से जुड़ी एक ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक धरोहर है। उन्होंने कहा कि न्यायालय के इस निर्णय ने उन ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्त्विक प्रमाणों को पुनः पुष्ट किया है, जो वर्षों से भोजशाला के प्राचीन हिन्दू मंदिर स्वरूप की पुष्टि करते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता का मूल स्वर ज्ञान, साधना, संस्कृति और अध्यात्म में निहित है तथा भोजशाला जैसी प्राचीन धरोहरें भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा की जीवंत प्रतीक हैं। न्यायालय का यह निर्णय न केवल ऐतिहासिक सत्य की प्रतिष्ठा करता है, बल्कि भावी पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत के प्रति जागरूक एवं गौरवान्वित करने का कार्य भी करेगा।

प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षण परम्परा, मंदिर संस्कृति एवं विद्या-उपासना के केन्द्रों ने विश्व को ज्ञान का आलोक प्रदान किया है। धार की भोजशाला भी उसी गौरवशाली परम्परा का एक महत्वपूर्ण अध्याय रही है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए प्रेरणास्पद है जो भारतीय संस्कृति, इतिहास और सनातन परम्पराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरन्तर कार्य कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों के आधार पर लिया गया यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक मर्यादा तथा न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे देशभर में सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति नई चेतना और सकारात्मक वातावरण का निर्माण होगा।
कुलपति ने आशा व्यक्त की कि भोजशाला परिसर का संरक्षण, संवर्धन एवं सांस्कृतिक गरिमा के अनुरूप विकास सुनिश्चित किया जाएगा, जिससे यह स्थल भारतीय संस्कृति, शिक्षा एवं आध्यात्मिक परम्परा के एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो सके।
अन्त में उन्होंने कहा, “सत्य चाहे जितने समय तक आवृत रहे, अंततः उसकी विजय निश्चित होती है। भोजशाला प्रकरण में आया यह निर्णय उसी सनातन सत्य और सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रतीक है।”










