वाराणसी। भोजशाला को हिंदू मंदिर मानते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय पर अस्सी स्थित आदि शंकराचार्य महासंस्थानम, श्री काशी सुमेरु मठ के जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे सनातन संस्कृति, ऐतिहासिक प्रमाणों और सत्य की विजय बताया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा कराए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुआ है कि भोजशाला की मूल संरचना प्राचीन मां सरस्वती मंदिर की रही है। उन्होंने कहा कि परिसर में मौजूद वैदिक स्थापत्य शैली, अलंकृत स्तंभ, कमल आकृतियां, संस्कृत शिलालेख तथा देवी-देवताओं से जुड़े चिह्न इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि वहां प्राचीन काल में वैदिक पूजा-अर्चना और सरस्वती साधना की परंपरा विद्यमान थी।
शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि भारतीय संस्कृति में मां सरस्वती को ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। प्राचीन गुरुकुलों एवं विद्यापीठों में विशेष रूप से वसंत पंचमी के अवसर पर भव्य सरस्वती पूजन की परंपरा रही है। उन्होंने बताया कि प्राचीन सरस्वती पूजन विधि वैदिक परंपराओं पर आधारित होती थी, जिसमें वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ कलश स्थापना, दीप प्रज्ज्वलन, श्वेत पुष्प अर्पण, वीणा एवं ग्रंथों का पूजन तथा विद्यार्थियों का विद्यारंभ संस्कार कराया जाता था।

उन्होंने कहा कि भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र रही होगी, जहां शिक्षा, दर्शन और आध्यात्मिक साधना का वातावरण विद्यमान था।
शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने केंद्र एवं राज्य सरकार से मांग की कि देश के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण, संवर्धन तथा उनकी ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए ठोस एवं प्रभावी कदम उठाए जाएं।









