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“कालनेमियों को पहचानना हिंदू समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती” : शंकराचार्य

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वाराणसी, 13 मई। गोरखपुर से निकली 81 दिवसीय “गविष्ठी गौरक्षार्थ धर्मयुद्ध यात्रा” बुधवार को काशी पहुंची, जहां जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज का विभिन्न स्थानों पर पुष्पवर्षा, ढोल-नगाड़ों और जयघोष के साथ भव्य स्वागत किया गया। यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं ने कलश यात्रा भी निकाली।

काशी की विभिन्न गौसभाओं को संबोधित करते हुए शंकराचार्य ने “कालनेमि को पहचानो” विषय पर ओजस्वी वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में धर्म के वेश में छिपे लोग ही हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। “माथे पर तिलक, मुख में जय श्रीराम और भीतर से गौहत्या का समर्थन करने वालों को पहचानना आवश्यक है,” उन्होंने कहा।

रामायण का उल्लेख करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि केवल धार्मिक वेश धारण कर लेने से कोई धर्मात्मा नहीं हो जाता, बल्कि हृदय में सनातन भाव होना चाहिए। उन्होंने धार्मिक प्रतीकों का उपयोग कर मांसाहार और गौहत्या को बढ़ावा देने वालों की भी तीखी आलोचना की।

गौरक्षा के मुद्दे पर उन्होंने ‘बीफ’ निर्यात पर सवाल उठाते हुए कहा कि भैंस के मांस के नाम पर गौमांस निर्यात किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गौहत्या में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन करने वाले भी पाप के भागी होते हैं।

इस दौरान हजारों लोगों ने वैदिक मंत्र “अहं हन्मि वृत्रं गविष्टौ” का सामूहिक उच्चारण कर गौरक्षा का संकल्प लिया। शंकराचार्य ने “एक वोट, एक नोट” अभियान के तहत गौधाम निर्माण का आह्वान करते हुए चेतावनी दी कि यदि सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए तो 24 जुलाई को लखनऊ में आंदोलन के अगले चरण की घोषणा की जाएगी।

मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने बताया कि यात्रा अब अजगरा, पिंडरा, सेवापुरी और भदोही की ओर प्रस्थान करेगी।

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