वाराणसी, 28 अप्रैल। अशांत और संघर्षों से जूझती वैश्विक परिस्थितियों के बीच बुद्ध पूर्णिमा का पावन पर्व मानवता को शांति, करुणा और आत्मजागरण का शाश्वत संदेश देता है। कुलपति प्रो॰ बिहारी लाल शर्मा ने इस अवसर पर कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में गौतम बुद्ध का व्यक्तित्व एक ऐसे दिव्य प्रकाश स्तंभ के समान है, जिसकी करुणामयी आभा युगों से मानव जीवन का मार्ग आलोकित करती रही है।
उन्होंने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा केवल एक महापुरुष की जयंती नहीं, बल्कि उस ज्ञान-ज्योति का महोत्सव है, जिसने जीवन के गूढ़तम प्रश्नों का सरल, व्यावहारिक और सार्वभौमिक समाधान प्रस्तुत किया। भारतीय मनीषा में ‘ज्ञान’ का अर्थ केवल बौद्धिकता नहीं, बल्कि जीवन के दुखों से मुक्ति का मार्ग है—जिसे गौतम बुद्ध ने अपने अनुभव से ‘धम्म’ के रूप में प्रतिपादित किया।
प्रो. शर्मा ने कहा कि बुद्ध का दर्शन भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यावहारिकता और जीवनपरक दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने जीवन के दुख, उसके कारण और निवारण का जो मार्ग बताया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ मानव जीवन में संतुलन, संयम और सजगता का संदेश देता है, जो न तो कठोर तपस्या की ओर झुकता है और न ही भोग-विलास की अति का समर्थन करता है।

“अप्प दीपो भव” का संदेश आज भी प्रासंगिक
कुलपति ने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा करुणा, मैत्री और अहिंसा के सार्वभौमिक मूल्यों का भी स्मरण कराती है। गौतम बुद्ध का संदेश “अप्प दीपो भव”—अर्थात स्वयं अपने प्रकाश बनो—आज के दौर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जब विश्व विभाजन, असहिष्णुता और संघर्ष की चुनौतियों से जूझ रहा है।
उन्होंने बताया कि बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ‘अष्टांगिक मार्ग’—सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि—मानव जीवन को संतुलित, अनुशासित और सार्थक बनाने का समग्र सूत्र प्रदान करता है। यह मार्ग व्यक्ति को आत्मशुद्धि और मानसिक स्थिरता की ओर अग्रसर करता है।
प्रो. शर्मा ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा की वास्तविक शक्ति उसके जीवन्त अनुप्रयोग में निहित है। गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारकर दिखाया, जिससे उनका संदेश सम्पूर्ण मानवता की अमूल्य धरोहर बन गया।
उन्होंने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर आवश्यक है कि लोग इसे केवल औपचारिक अनुष्ठान तक सीमित न रखें, बल्कि इसके मूल संदेश—जागरूकता, करुणा और संयम—को अपने जीवन में उतारें। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही समाज के समग्र कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगी।
अंत में उन्होंने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा भारतीय ज्ञान परंपरा के उस उज्ज्वल पक्ष का प्रतीक है, जो मनुष्य को उसके अंतर्मन से जोड़कर सत्य, शांति और सह-अस्तित्व की दिशा में प्रेरित करता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वास्तविक प्रगति बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आंतरिक परिष्कार में निहित है।









