वाराणसी, 26 अप्रैल। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए प्रकाशन समिति की बैठक में 30 दुर्लभ संस्कृत एवं पालि ग्रंथों के पुनर्मुद्रण को स्वीकृति प्रदान की गई। इसके साथ ही विद्वानों से प्राप्त प्रस्तावों में से 6 नए ग्रंथों के प्रकाशन को भी मंजूरी दी गई।
कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा की अध्यक्षता में रविवार अपराह्न कुलपति कार्यालय में आयोजित बैठक में व्यापक विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया। बैठक में बताया गया कि विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व में प्रकाशित कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की देशभर में निरंतर मांग बनी हुई है, जिसके मद्देनजर उनके पुनर्मुद्रण का निर्णय लिया गया।
स्वीकृत ग्रंथों में काशी खंड, बृहत्संहिता, जैमिनी सूत्रम, अभिधम्मत संग्रहो, काशी महात्म्य, प्रक्रिया कौमुदी, जातकर्म संस्कार, कर्णभेद संस्कार तथा तंत्र संग्रह सहित कुल 30 महत्वपूर्ण कृतियां शामिल हैं। इन ग्रंथों के पुनर्प्रकाशन से न केवल शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी बल मिलेगा।

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि विश्वविद्यालय की अध्ययनमाला एवं ग्रंथमाला के अंतर्गत, अनुदान उपलब्ध होने पर अन्य ग्रंथों का प्रकाशन किया जाएगा। साथ ही प्रकाशन विभाग को प्राप्त 8 प्रस्तावों में से 6 को स्वीकृति देकर नए शोध कार्यों को प्रोत्साहन दिया गया।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित ग्रंथों की मांग पूरे देश में लगातार बनी रहती है। उन्होंने कहा कि दुर्लभ पांडुलिपियों का संपादन एवं मूल ग्रंथों का पुनर्प्रकाशन भारतीय ज्ञान विरासत को नई ऊर्जा प्रदान करेगा। साथ ही उन्होंने बताया कि पुस्तकों के सुव्यवस्थित वितरण के लिए विश्वविद्यालय का विक्रय विभाग सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है, जिससे मांग के अनुरूप ग्रंथ देशभर में उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
बैठक में कुलसचिव राकेश कुमार, प्रो. शीतला प्रसाद उपाध्याय, प्रो. जीतेन्द्र कुमार, प्रो. महेन्द्र पाण्डेय, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. विशाखा शुक्ला एवं श्री कौशल कुमार झा सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।









