वाराणसी। होली केवल रंगों और उल्लास का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभावना की सशक्त अभिव्यक्ति है। यह बात संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के जनसम्पर्क अधिकारी शशीन्द्र मिश्र ने होली के अवसर पर जारी अपने संदेश में कही।
उन्होंने कहा कि भारत के उत्सव हमारी सनातन परम्पराओं और मूल्यों के संवाहक हैं। होली सत्य की असत्य पर, प्रेम की घृणा पर तथा धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है। होलिका-दहन हमें अपने भीतर के अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या और संकीर्णता को त्यागने की प्रेरणा देता है। जिस प्रकार अग्नि अशुद्धियों को भस्म कर देती है, उसी प्रकार हमें भी आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए।
श्री मिश्र ने वेद मंत्र “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मंत्र समाज को एकात्मता, संवाद और सामूहिक चिंतन का संदेश देता है। होली का पर्व इसी भावना को साकार करता है, जब समाज के विभिन्न वर्ग आपसी भेदभाव भुलाकर प्रेम और सौहार्द के रंग में रंग जाते हैं।

उन्होंने कहा कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है। होली सामाजिक समरसता, पारस्परिक सम्मान और सौहार्द का सजीव अभ्यास कराती है। राष्ट्रप्रेम को भारतीय संस्कारों का विस्तार बताते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि हमारी भाषा, संस्कृति, परम्परा और साझा स्मृतियों का जीवंत स्वरूप है। समाजहित को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।
उन्होंने विश्वविद्यालय की शैक्षिक परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा कि हम सभी को भारतीय संस्कृति, संस्कृत भाषा और सनातन मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन का संकल्प लेना चाहिए। अंत में उन्होंने सभी नागरिकों को होली महापर्व की हार्दिक, मंगलमयी एवं राष्ट्रोन्नति से परिपूर्ण शुभकामनाएँ दीं।









