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बलूचिस्तान की पुकार और पाकिस्तान की सच्चाई, “पाकिस्तान को उखाड़ फेंको, हम भारत के साथ हैं” — जयशंकर को लिखे खुले पत्र ने हिला दी दक्षिण एशिया की राजनीति

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दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बार फिर ऐसा भूचाल आया है, जिसकी गूंज सीमाओं से परे सुनाई दे रही है। बलूचिस्तान के वरिष्ठ नेता मीर यार बलूच द्वारा भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को लिखा गया खुला पत्र केवल एक समर्थन-पत्र नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नीतियों, उसकी आंतरिक विफलताओं और चीन के साथ उसके खतरनाक गठजोड़ का जीवंत दस्तावेज़ है। पत्र की सबसे तीखी पंक्ति— “पाकिस्तान को उखाड़ फेंको, हम भारत के साथ हैं”— आज पाकिस्तान के भीतर पनप रहे असंतोष और विद्रोह की मानसिकता को बेनकाब कर देती है। बलूचिस्तान, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, दशकों से पाकिस्तान की सत्ता और सेना के दमन का शिकार रहा है। मीर यार बलूच का पत्र इसी ऐतिहासिक पीड़ा का स्वर है। यह वह आवाज़ है, जो बताती है कि पाकिस्तान की एकता अब केवल नक्शों और दावों तक सिमटती जा रही है, जबकि ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक विस्फोटक है। जब कोई क्षेत्रीय नेता खुले तौर पर भारत से समर्थन की अपील करता है, तो यह पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति पर एक कठोर टिप्पणी बन जाती है। मीर यार बलूच का दावा है कि चीन, आर्थिक परियोजनाओं की आड़ में पाकिस्तान में अपने सैन्य पांव पसार रहा है। CPEC अब केवल विकास परियोजना नहीं, बल्कि बलूचिस्तान के संसाधनों की लूट और भविष्य में चीनी सैन्य तैनाती का मार्ग बनता दिख रहा है। यदि यह सच है, तो यह केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए एक चेतावनी बन जाता है। भारत के संदर्भ में यह पत्र एक अलग ही अर्थ रखता है। बलूच नेता भारत को लोकतंत्र, मानवाधिकार और उत्पीड़ित आवाज़ों का स्वाभाविक समर्थक मानते हैं। यह विश्वास यूं ही नहीं उपजा है। भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकारों और क्षेत्रीय स्थिरता की बात की है, जबकि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी, सैन्य अत्याचार और असहमति के दमन की नीति अपनाई है। यही कारण है कि आज बलूचिस्तान की पीड़ा भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। मीर यार बलूच का पत्र पाकिस्तान की उस सच्चाई को सामने लाता है, जिसे लंबे समय तक बंद कमरों और बंदूक के साए में दबाने की कोशिश की गई। यह पत्र बताता है कि पाकिस्तान की समस्या बाहरी नहीं, बल्कि उसकी अपनी नीतियों की उपज है। जब कोई देश अपने ही नागरिकों को न्याय, सम्मान और अधिकार नहीं दे पाता, तो विद्रोह केवल संभावना नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन जाता है। आज यह सवाल केवल पाकिस्तान या बलूचिस्तान का नहीं है। यह सवाल है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय उन आवाज़ों को सुनेगा, जो दमन के अंधेरे से निकलकर सच बोल रही हैं? और क्या चीन-पाकिस्तान की यह रणनीतिक सांठगांठ क्षेत्रीय शांति को निगलने से पहले रोकी जा सकेगी? मीर यार बलूच का खुला पत्र एक चेतावनी भी है और एक संकेत भी—चेतावनी उन ताकतों के लिए, जो बल के सहारे एकता बनाए रखना चाहती हैं, और संकेत उन लोगों के लिए, जो मानते हैं कि लोकतंत्र और मानवाधिकार अंततः हर दमन से बड़े होते हैं। बलूचिस्तान की पुकार अब अनसुनी नहीं की जा सकती। यह आवाज़ सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ है—और यही इसे एक साधारण पत्र से उठाकर इतिहास का दस्तावेज़ बना देती है।

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