वाराणसी, 18 जून 2026। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के योग साधना केन्द्र में गुरुवार को “मानव जीवन में योग तथा आयुर्वेद का महत्व” विषयक एक दिवसीय अखिल भारतीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता करते हुए योग और आयुर्वेद की समकालीन उपयोगिता तथा मानव कल्याण में उनकी भूमिका पर व्यापक विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विहारी लाल शर्मा ने कहा कि योग और आयुर्वेद भारतीय ज्ञानपरम्परा की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जो केवल रोग निवारण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मानव के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास का समग्र मार्ग प्रशस्त करती हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, अवसाद और असंतुलित जीवनशैली से उत्पन्न चुनौतियों का प्रभावी समाधान योग एवं आयुर्वेद की जीवनदृष्टि में निहित है। उन्होंने युवाओं से भारतीय ज्ञान-विज्ञान की इस महान परम्परा को आत्मसात करने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता एवं काय चिकित्सक डॉ. अजय कुमार ने कहा कि आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ एवं संतुलित जीवन जीने का विज्ञान है। उन्होंने दिनचर्या, ऋतुचर्या, संतुलित आहार-विहार और नियमित योगाभ्यास को स्वास्थ्य संवर्धन का आधार बताते हुए कहा कि आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न अधिकांश विकारों का समाधान योग और आयुर्वेद के समन्वित प्रयोग में निहित है।

विशिष्ट वक्ता प्रो. रामपूजन पाण्डेय ने कहा कि भारतीय ऋषियों द्वारा प्रतिपादित योग और आयुर्वेद मानवता के कल्याण हेतु विकसित ऐसे ज्ञान-विज्ञान हैं, जिनकी उपयोगिता आज विश्वभर में स्वीकार की जा रही है।
वरिष्ठ आचार्य प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि योग व्यक्ति को आत्मानुशासन, आत्मबोध और आत्मविश्वास प्रदान करता है, जबकि आयुर्वेद प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर दीर्घकालिक स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करता है।
सारस्वत वक्ता एवं छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष प्रो. शैलेश कुमार मिश्र ने योग और आयुर्वेद को भारतीय संस्कृति की आत्मा बताते हुए कहा कि इनके माध्यम से व्यक्ति न केवल निरोगी बनता है, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक रूप से भी समृद्ध होता है। उन्होंने विद्यार्थियों से नियमित योगाभ्यास एवं स्वास्थ्यपरक जीवनशैली अपनाने का आग्रह किया।
संगोष्ठी में प्रो. जितेन्द्र कुमार एवं प्रो. राजनाथ ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए योग और आयुर्वेद की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. दुर्गेश पाठक ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक आयोजनों का उद्देश्य भारतीय ज्ञानपरम्परा के वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्ष को समाज के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना है। उन्होंने कहा कि योग एवं आयुर्वेद आज वैश्विक स्वास्थ्य और कल्याण के विश्वसनीय आधार के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
अंत में प्रो. रविशंकर पाण्डेय ने सभी अतिथियों, विद्वानों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी में व्यक्त विचार समाज को स्वस्थ, जागरूक और संस्कारित बनाने की दिशा में प्रेरणादायी सिद्ध होंगे।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रकल्याण, मानव स्वास्थ्य तथा भारतीय ज्ञानपरम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन के संकल्प के साथ हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।









