वाराणसी, 26 मई। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने संस्कृत की परम्परागत विद्याओं के संरक्षण, संवर्धन एवं इन विषयों से जुड़े विद्यार्थियों और शोधार्थियों के अधिकारों की रक्षा को लेकर मध्यप्रदेश शासन से संवेदनशील पुनर्विचार का आग्रह किया है। उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक विस्तृत एवं भावनात्मक पत्र भेजकर संस्कृत सहायक प्राध्यापक नियुक्तियों में यूजीसी मान्य सभी पारम्परिक संस्कृत विषयों को शामिल करने की मांग उठाई है।
कुलपति प्रो. शर्मा ने अपने पत्र में कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की दार्शनिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक चेतना की मूल आधारशिला है। न्याय, मीमांसा, ज्योतिष, वेदान्त, धर्मशास्त्र, आगम, पुराण, सांख्ययोग, नव्य न्याय तथा अन्य पारम्परिक शास्त्र भारतीय ज्ञान-विज्ञान की गौरवशाली परम्परा के संवाहक हैं, जिन्होंने हजारों वर्षों से राष्ट्र की वैचारिक दिशा निर्धारित की है।
उन्होंने मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा आयोग द्वारा संस्कृत सहायक प्राध्यापक पदों के लिए सीमित विषयों को ही सह-विषय के रूप में मान्यता दिए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस व्यवस्था के कारण ज्योतिष, सिद्धान्त ज्योतिष, नव्य न्याय, मीमांसा, नव्य व्याकरण, तुलनात्मक दर्शन, धर्मशास्त्र, आगम, पुराणेतिहास और माधव वेदान्त जैसे विषयों में अध्ययनरत अनेक प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएं आवेदन प्रक्रिया से वंचित हो रहे हैं।

कुलपति ने स्पष्ट कहा कि इन विषयों के अनेक विद्यार्थी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) तथा विद्यावाचस्पति जैसी राष्ट्रीय स्तर की योग्यताएं प्राप्त कर चुके हैं, इसके बावजूद उन्हें नियुक्तियों में अवसर न मिलना चिंताजनक है। उन्होंने इसे संस्कृत की समृद्ध शास्त्रीय परम्परा और वर्षों से इन विषयों में साधनारत विद्यार्थियों के भविष्य के साथ अन्याय बताया।
प्रो. शर्मा ने अपने पत्र में नई शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान-परम्परा, बहुविषयी अध्ययन और शास्त्रीय विद्याओं के संवर्धन पर विशेष बल देती है। ऐसे में संस्कृत की पारम्परिक शाखाओं को सीमित दायरे में बांधना नीति की मूल भावना के विपरीत है।
उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त सभी पारम्परिक संस्कृत विषयों को संस्कृत सहायक प्राध्यापक नियुक्तियों की सह-विषय सूची में शामिल करने के लिए सकारात्मक और न्यायोचित निर्णय लिया जाए, ताकि संस्कृत की विविध शास्त्रीय परम्पराओं का संरक्षण सुनिश्चित हो सके और हजारों विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को समान अवसर प्राप्त हो।
कुलपति ने इस विषय पर विशेषज्ञों की समिति गठित कर संतुलित एवं न्यायपूर्ण समाधान निकालने का भी सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की अकादमिक निरन्तरता बनाए रखने तथा संस्कृत की शास्त्रीय परम्परा को अक्षुण्ण रखने के लिए यह निर्णय अत्यंत आवश्यक है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने आशा व्यक्त की है कि मध्यप्रदेश शासन शिक्षा, संस्कृति और युवाओं के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर संवेदनशील एवं सकारात्मक पहल करेगा, जिससे संस्कृत की परम्परागत विद्याओं को नई ऊर्जा और संरक्षण प्राप्त हो सके।









