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“शोधनिबन्धचन्द्रिका” का भव्य लोकार्पण, संस्कृत शोध-जगत को मिलेगी नई दिशा

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वाराणसी, 17 जून। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञानपरम्परा, संस्कृत शोध एवं शास्त्रीय चिन्तन को समर्पित एक महत्वपूर्ण अवसर पर विश्वविद्यालय के सेवा-निवृत्त वेदान्तशास्त्र के प्रख्यात आचार्य प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी द्वारा रचित त्रिखण्डीय ग्रन्थ “शोधनिबन्धचन्द्रिका” का लोकार्पण कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कुलसचिव राकेश कुमार (आईएएस) की उपस्थिति में किया।

इस अवसर पर कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि “शोधनिबन्धचन्द्रिका केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि संस्कृत शोध-जगत के लिए एक सशक्त मार्गदर्शी ग्रन्थ है।” उन्होंने बताया कि प्रो. त्रिपाठी ने अपने दीर्घ अध्यापन अनुभव, गहन अध्ययन एवं मौलिक अनुसंधान के आधार पर शोध-पद्धति, शास्त्रीय विश्लेषण और अकादमिक लेखन के विविध आयामों का प्रामाणिक एवं व्यवस्थित निरूपण किया है।

कुलपति ने कहा कि भारतीय ज्ञानपरम्परा के पुनर्जागरण के वर्तमान दौर में यह ग्रन्थ शोधार्थियों, अध्येताओं और शिक्षकों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा तथा संस्कृत एवं भारतीय दर्शन के क्षेत्र में नवीन शोध-दृष्टि विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

कुलसचिव राकेश कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्यों की साहित्य-साधना संस्थान की अकादमिक उत्कृष्टता और बौद्धिक समृद्धि का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह पुस्तकरूप में समाज और नई पीढ़ी तक पहुंचकर उन्हें दिशा प्रदान करे।

ग्रन्थकार प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी ने बताया कि “शोधनिबन्धचन्द्रिका” के तीनों खण्डों में संस्कृत एवं भारतीय दर्शन से जुड़े विविध विषयों पर उनके दीर्घकालीन अनुसंधान, शोध-निबन्धों तथा शास्त्रीय विमर्शों का समावेश किया गया है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह कृति शोधार्थियों और विद्वानों के लिए एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ-ग्रन्थ सिद्ध होगी।

कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों एवं शिक्षकों ने इस ग्रन्थ को संस्कृत जगत के लिए अत्यंत मूल्यवान उपलब्धि बताते हुए कहा कि इसमें संकलित शोध-निबन्ध शास्त्रीय गाम्भीर्य, तार्किक विश्लेषण, प्रामाणिक सन्दर्भों और मौलिक चिन्तन का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करते हैं।

उल्लेखनीय है कि प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी वेदान्तशास्त्र के सुप्रसिद्ध विद्वान रहे हैं और उन्होंने संस्कृत साहित्य तथा भारतीय दर्शन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी नवीन कृति “शोधनिबन्धचन्द्रिका” को विश्वविद्यालय की गौरवशाली विद्वत्परम्परा को समृद्ध करने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

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