अयोध्या/वाराणसी, 15 अप्रैल 2026।राम जन्मभूमि परिसर में स्थापित ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ‘1008’ महाराज ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चम्पत राय को पत्र लिखकर इस विषय पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है।
शंकराचार्य ने अपने पत्र में अयोध्या स्थित भगवान श्रीराम की जन्मभूमि के मूल स्थान की शास्त्रीय स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्थल सनातन परंपराओं के अनुसार अत्यंत संवेदनशील और अपरिवर्तनीय है। उन्होंने ट्रस्ट से स्पष्ट करने को कहा है कि क्या वर्तमान भव्य मंदिर का गर्भगृह उसी मूल जन्मस्थान पर निर्मित है या उससे अलग।
महाराज श्री ने कहा कि जिस स्थान पर पूर्व में केंद्रीय गुंबद स्थित था और जहां लंबे समय तक भगवान का चल विग्रह स्थापित रहा, वह स्थल विशेष रूप से पवित्र और ऊर्जा से युक्त है। ऐसे में गर्भगृह का स्थान बदलना शास्त्रों की दृष्टि से गंभीर त्रुटि मानी जाएगी।

वहीं, ट्रस्ट द्वारा उस स्थान पर स्थापित पीतल की ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति पर भी उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ज्योति का अर्थ साक्षात अग्नि तत्व है और बिना घी, तेल तथा वर्तिका के किसी धातु आकृति को ‘ज्योति’ कहना शास्त्रीय मर्यादाओं के विपरीत है। उन्होंने इसे “अक्षम्य भूल” और शब्दों का भ्रम पैदा करने वाला बताया।
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि जो आकृति स्वयं प्रकाश उत्पन्न करने के बजाय विद्युत पर निर्भर हो, उसे ‘अखंड ज्योति’ कहना सनातन धर्म की मूल अवधारणाओं के विरुद्ध है। उन्होंने ट्रस्ट को निर्देश दिया कि उक्त धातु कलाकृति को तत्काल हटाकर वहां विधि-विधान से घी या तेल के दीपक के रूप में वास्तविक ज्योति स्थापित की जाए।
पत्र में शंकराचार्य ने यह भी चेताया कि राम मंदिर जैसे आस्था के केंद्र पर परंपराओं की उपेक्षा और अति-आधुनिकीकरण भविष्य में गंभीर परिणाम ला सकता है। उन्होंने ट्रस्ट से अपेक्षा जताई कि वह इस विषय में शीघ्र स्पष्टता प्रदान कर श्रद्धालुओं के बीच उत्पन्न हो रही भ्रांतियों को दूर करेगा।इस संबंध में जानकारी शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय द्वारा दी गई है।









