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मातृभाषा में उच्च शिक्षा का महाअभियान: राष्ट्रीय कार्यशाला में काशी की गौरवपूर्ण भागीदारी, 22 भारतीय भाषाओं में उच्चस्तरीय ग्रंथ-लेखन के संकल्प को मिला नया आयाम

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वाराणसी, 25 फरवरी 2026। भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल के तहत शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की इकाई भारतीय भाषा समिति द्वारा नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में काशी की शैक्षिक परंपरा ने उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई।

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विभाग के आचार्य डॉ. रविशंकर पाण्डेय को इस एक दिवसीय कार्यशाला में संसाधन व्यक्ति के रूप में आमंत्रित किया गया। 24 फरवरी 2026 को संपन्न इस कार्यशाला में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए प्रख्यात विद्वानों, शिक्षाविदों एवं विषय-विशेषज्ञों ने भाग लेकर भारतीय भाषाओं में उच्चस्तरीय पाठ्यपुस्तकों के लेखन एवं अनुवाद की व्यापक कार्य-योजना पर गहन मंथन किया।

शिक्षा मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप प्रारंभ की गई “भारतीय भाषा पुस्तक योजना” का उद्देश्य उच्च शिक्षा को मातृभाषाओं से जोड़ते हुए ज्ञान के लोकतंत्रीकरण को सुनिश्चित करना है। इस महत्त्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, न्यायशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र सहित विविध विषयों के मौलिक ग्रंथ-लेखन एवं गुणवत्तापूर्ण अनुवाद का कार्य 22 भारतीय भाषाओं में किया जाएगा।

विशेषज्ञों का मत है कि यह पहल न केवल विद्यार्थियों को अपनी भाषा में अध्ययन का अवसर प्रदान करेगी, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विषय-विज्ञान के मध्य एक सशक्त सेतु का निर्माण भी करेगी। संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं में आधुनिक विषयों की पाठ्यपुस्तकों का सृजन उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का आधार बनेगा।

कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के नेतृत्व में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय को इस राष्ट्रीय योजना का प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में ठोस प्रयास प्रारंभ कर दिए गए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि भारतीय भाषाओं के संवर्धन और ज्ञान-विस्तार में काशी की ऐतिहासिक भूमिका को पुनः प्रतिष्ठित करने का यह सुनहरा अवसर है।

डॉ. रविशंकर पाण्डेय ने कार्यशाला के उपरांत कहा कि “भारतीय भाषा पुस्तक योजना” भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में युगांतकारी कदम है। इससे न केवल विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध होगी, बल्कि देश की भाषाई विविधता को भी सशक्त आधार मिलेगा। निस्संदेह, यह पहल भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत का संकेत है, जो मातृभाषा के माध्यम से ज्ञान-सृजन और प्रसार को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।

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