वाराणसी। वर्षा ऋतु अपने साथ हरियाली, ठंडक और प्राकृतिक सौंदर्य लेकर आती है, लेकिन इसी मौसम में डेंगू, मलेरिया और अन्य संक्रामक रोगों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। ऐसे में थोड़ी-सी सावधानी और संतुलित दिनचर्या अपनाकर इन बीमारियों से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है। यह जानकारी अनंत योग काशी, वाराणसी की चिकित्सक डॉ. स्वाति तिवारी ने दी।
उन्होंने बताया कि आयुर्वेद में वर्षा ऋतु को स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना गया है। इस दौरान शरीर की जठराग्नि (पाचन शक्ति) कमजोर हो जाती है तथा वात दोष का प्रकोप बढ़ने लगता है। यदि इस मौसम में उचित आहार-विहार का पालन नहीं किया जाए तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और व्यक्ति विभिन्न संक्रामक रोगों की चपेट में आ सकता है। आयुर्वेद में “निदान परिवर्जन” अर्थात रोग के कारणों से बचाव को सबसे प्रभावी उपचार माना गया है।
डॉ. तिवारी ने बताया कि वर्षा ऋतु में हल्का, ताजा, गर्म और सुपाच्य भोजन करना चाहिए। मूंग की दाल, पुराना चावल, हरी सब्जियां, सूप तथा दलिया जैसे खाद्य पदार्थ इस मौसम में लाभकारी माने गए हैं। वहीं बासी भोजन, तले-भुने व्यंजन, अत्यधिक ठंडी चीजें और दूषित भोजन से बचना चाहिए, क्योंकि ये पाचन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

उन्होंने कहा कि बरसात के मौसम में जल स्रोत आसानी से दूषित हो सकते हैं। इसलिए हमेशा उबला हुआ या शुद्ध पानी ही पीना चाहिए, जिससे जलजनित संक्रमणों का खतरा कम किया जा सके।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आयुर्वेद में गिलोय, तुलसी, अदरक, हल्दी और आंवला जैसी औषधीय वनस्पतियों को उपयोगी बताया गया है। हालांकि इनका सेवन किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।
उन्होंने नियमित दिनचर्या अपनाने पर भी विशेष जोर देते हुए कहा कि समय पर सोना-जागना, नियमित योग, प्राणायाम, हल्का व्यायाम तथा पर्याप्त नींद शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डॉ. स्वाति तिवारी ने कहा कि वर्षा ऋतु का आनंद तभी लिया जा सकता है, जब स्वास्थ्य के प्रति पूरी सतर्कता बरती जाए। संतुलित आहार, स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल, नियमित दिनचर्या और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले उपाय अपनाकर डेंगू, मलेरिया सहित वर्षाजनित अनेक बीमारियों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।










