नई दिल्ली। नई दिल्ली स्थित केशव कुंज साधना सभागार में आयोजित एक गरिमामय साहित्यिक समारोह में भारतीय संस्कृति, दर्शन और ज्ञान परम्परा के प्रतिष्ठित विद्वान प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल की पाँच महत्वपूर्ण पुस्तकों का भव्य लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर विद्वानों, शिक्षाविदों और बौद्धिक जगत से जुड़े लोगों की बड़ी उपस्थिति रही, जिससे कार्यक्रम का वातावरण अत्यंत उत्साहपूर्ण और ज्ञानवर्धक बना रहा।
प्रो. शुक्ल महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के पूर्व कुलपति रह चुके हैं तथा वर्तमान में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के तुलनात्मक धर्म-दर्शन विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। समारोह में उनकी पाँच पुस्तकों — गौरवशाली संस्कृति, भारत की ज्ञान संस्कृति, इंडियन नॉलेज सिस्टम, सत्य का उत्तराधिकारी तथा अथ नचिकेतोपाख्यान — का लोकार्पण किया गया।
इन पुस्तकों का लोकार्पण सुरेश सोनी, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य हैं, तथा पूर्व सांसद एवं सामाजिक चिंतक गोपाल नारायण सिंह सहित अन्य गणमान्य अतिथियों के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।

इस अवसर पर श्री सुरेश सोनी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के निर्माण की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि प्रो. शुक्ल के ये ग्रंथ भारतीय चिंतन की गहराई को उजागर करते हैं और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करेंगे।
पूर्व सांसद गोपाल नारायण सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि आज विश्व भारत की ज्ञान परम्परा की ओर आशा और विश्वास से देख रहा है। ऐसे समय में प्रो. शुक्ल की कृतियाँ भारतीय बौद्धिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी।
समारोह में प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि प्रो. शुक्ल का यह विद्वतापूर्ण कार्य भारतीय संस्कृति और दर्शन के गंभीर अध्ययन को नई दिशा देता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ये पुस्तकें विद्वानों, शोधार्थियों और छात्रों के लिए अमूल्य संसाधन सिद्ध होंगी।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय परिवार के अनेक विद्वान — प्रो. रामपूजन पाण्डेय, प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो. शैलेश कुमार मिश्र, प्रो. महेन्द्र पांडेय, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग तथा प्रो. अमित कुमार शुक्ल — सहित कई आचार्य उपस्थित रहे। सभी ने इसे विश्वविद्यालय और विद्वत् समाज के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया।
अंत में विद्वानों ने आशा व्यक्त की कि प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल का यह साहित्यिक योगदान भारतीय संस्कृति, दर्शन और ज्ञान परम्परा के संवर्धन में दूरगामी प्रभाव डालेगा तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।









