काशी। ” ताजदार-ए-हरम, हो निगाहे करम । हम गरीबों के दिन भी संवर जायेगे” । साबरी ब्रदर्स के इस सूफी कलाम की स्थानीय कव्वालोी द्वारा की गयी पेश अदायगी से रात इबादत गुजार हो गई। मौका था हजरत जलालुद्दीन शाह के दो दिवसीय उर्स का। उपरोक्त लाइनों में छुपे मौजूदा हालात की कशमकश लोगों की आंखो को नम कर गई।
दो रोजा उर्स का आगाज कुरानख्वानी से किया गया। गुश्ल और शंदलपोशी के साथ ही गागर-चादर का नजराना पेश किया गया। मुकामी कव्वालों ने अकीदत से लबरेज सूफी कलामों की सोमवार की रात बयार बहाई । इससे पूर्व अहमद आजमी, मुख्तार बनारसी, शमीम गाजीपुरी, नवाब बनारसी आदि शोहराओं ने नात-ए- पाक पेशकर रात रुहानी की। मीलाद शरीफ और तवर्रुख तकसीम कर अकीदत को बुलंदी दी गई। प्रबंध कमेटी के मोहम्मद हलीम साहब की देखरेख में साम्प्रदायिक सौहार्द के बीच उर्स का समापन किया गया।काइस मौके पर जायरीन अकीदतमंदों की लंबी कतारे फातिहाख्वानी और सिरनी से अकीदत पेश किया।









