वाराणसी :- अपर जिला जज (सप्तम) विकास कुमार की अदालत में वर्ष 1991 के ज्ञानवापी प्रकरण में नियुक्त वाद मित्र अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी के खिलाफ दाखिल रिवीजन अर्जी पर मंगलवार को सुनवाई हुई। इस रिवीजन में 11 अक्तूबर 2019 के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत विजय शंकर रस्तोगी को वाद मित्र के रूप में नियुक्त किया गया था। मूल पत्रावली तलब करने का अनुरोधसुनवाई के दौरान रिवीजन अर्जी की पैरवी कर रहे अधिवक्ता की ओर से अदालत से प्रकरण की मूल पत्रावली तलब करने का अनुरोध किया गया। अदालत ने प्रकरण का अवलोकन करने के लिए समय लेते हुए अगली सुनवाई की तारीख एक दिसंबर तय कर दी। आपत्ति और प्रति‑आपत्ति दाखिलवाद मित्र की नियुक्ति के खिलाफ विपक्ष की ओर से पूर्व में आपत्ति दाखिल की जा चुकी है, जिसमें नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। मंगलवार की सुनवाई के दौरान विपक्ष की आपत्ति के विरुद्ध प्रति‑आपत्ति भी दाखिल की गई, जिस पर अगली तारीख को विस्तार से सुनवाई होने की संभावना है। नियुक्ति पर पारदर्शिता के सवालरिवीजन अर्जी में कहा गया है कि 11 अक्तूबर 2019 के आदेश से विजय शंकर रस्तोगी को वाद मित्र नियुक्त किया गया था, लेकिन यह नियुक्ति एकतरफा, बिना पारदर्शिता और बिना किसी सार्वजनिक सूचना के की गई। अर्जी में यह भी उल्लेख है कि रस्तोगी पूर्व में वादी पक्ष के अधिवक्ता रह चुके हैं, जिससे हितों के टकराव (कॉनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) का आरोप लगाया गया है।1991 के मूल वाद की पृष्ठभूमि ज्ञानवापी विवाद का मूल वाद वर्ष 1991 से लंबित है, जिसमें परिसर में स्थित प्राचीन मंदिर के पुनर्स्थापन और धार्मिक स्वरूप से जुड़े दावे किए गए हैं। इस प्रकरण में वाद मित्र की भूमिका अदालत की सहायता करने और तथ्यों व कानून के बिंदुओं पर निष्पक्ष राय रखने के लिए मानी जाती है, जिस पर अब रिवीजन के जरिए प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं।









