वाराणसी। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी जहां अपनी आध्यात्मिक पहचान के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वहीं यहां की पारंपरिक वैद्यकीय पद्धतियां भी लोगों के बीच खास स्थान रखती हैं। मछोदरी क्षेत्र में वर्ष 1885 से तैयार किया जा रहा दर्द निवारक ‘सुरती का तेल (रोगन सुरती)’ इन दिनों एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है।
बताया जाता है कि इस तेल का निर्माण सबसे पहले डॉ. गणेश प्रसाद भार्गव ने शुरू किया था। वर्षों से यह तेल लोगों के बीच उपयोग में लाया जा रहा है और दर्द निवारण में लाभकारी माना जाता है।
डॉ. गणेश प्रसाद भार्गव के प्रपौत्र कुश राज भार्गव ने बताया कि यह तेल लकवा, जोड़ों के दर्द, गठिया, हाथ-पैरों की ऐंठन, सूजन तथा चोट-मोच जैसी समस्याओं में उपयोगी माना जाता है। उन्होंने बताया कि सरसों का तेल, खैनी सुरती एवं विभिन्न जड़ी-बूटियों के मिश्रण से इसे तैयार किया जाता है और इसकी निर्माण प्रक्रिया में लगभग दो दिन का समय लगता है।

उन्होंने कहा कि यह तेल 50 एवं 100 ग्राम की शीशियों में कम कीमत पर उपलब्ध है। कुश भार्गव के अनुसार बीते लगभग 140 वर्षों से उनका परिवार इस पारंपरिक औषधीय तेल के माध्यम से लोगों की सेवा करता आ रहा है।









