वाराणसी, 26 फरवरी 2026। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परम्परा केन्द्र द्वारा “काश्या न्यायदर्शनपरम्पराया उद्भवो विकासश्च” विषयक ऑनलाइन व्याख्यानमाला का आयोजन प्रो. रामपूजन पाण्डेय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में काशी की न्याय-वैशेषिक परम्परा के उद्भव, विकास एवं उसके दार्शनिक अवदान को सम्यक् रूप से रेखांकित करना रहा।
मुख्य वक्ता डॉ. मुनीश कुमार मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय चिंतन परम्परा में ‘आन्वीक्षिकी’ अर्थात न्याय-दर्शन को समस्त विद्याओं का प्रदीप माना गया है। उन्होंने काशी को महर्षि कणाद की तपःभूमि बताते हुए स्पष्ट किया कि न्याय-वैशेषिक दर्शन केवल तर्कशास्त्र नहीं, बल्कि साधना, आत्मबोध और धर्मसंरक्षण से समन्वित एक दिव्य विद्या है। “न धनेन न धान्येन त्यजते कदाचन” उक्ति के माध्यम से उन्होंने काशी की तात्त्विक परम्परा की आध्यात्मिक आधारभूमि को रेखांकित किया।
वक्ता ने देवीपुराण के शुम्भ-निशुम्भ प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान शिव ने महर्षि गौतम को ‘आन्वीक्षिकी’ विद्या का उपदेश प्रदान किया—

“साधु गौतम भद्रं ते तर्केषु कुशलो स्यसि…”
तथा शिवकृपा से गौतम द्वारा इस विद्या के पृथ्वी पर प्रचार का वर्णन—
“शम्भोः कृपामनुप्राप्य… विद्या प्रावर्तयत् क्षितौ॥”
उन्होंने न्याय के ‘षोडश पदार्थों’ के सिद्धान्त तथा गौतम के ‘अक्षपाद’ नाम की उत्पत्ति का भी उल्लेख किया—
“पादेऽक्षि स्फोटयामास सोऽक्षपादोऽभवत्ततः।”
व्याख्यान के उपसंहार में ‘न्यायभाष्य’ का प्रसिद्ध वचन—
“प्रदीपः सर्वविद्यानाम् उपायः सर्वकर्मणाम्।
आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षिकी मता॥”
उद्धृत करते हुए डॉ. मिश्र ने कहा कि न्याय-दर्शन ने भारतीय चिंतन को तार्किक अनुशासन, बौद्धिक स्पष्टता और धर्मसंरक्षण का सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। काशी की यह परम्परा आज भी भारतीय ज्ञान-संरचना की जीवन्त धारा के रूप में प्रवहमान है।
प्रश्नोत्तर सत्र में विद्वानों एवं शोधार्थियों ने न्याय, वैशेषिक तथा पुराणोक्त परम्पराओं के अंतर्संबंधों पर गंभीर जिज्ञासाएँ प्रस्तुत कीं। अंत में डॉ. आशीष मणि त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि ऐसी व्याख्यानमालाएँ भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनरुत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी।
कार्यक्रम में प्रो. रामपूजन पाण्डेय, डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा, डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. विजय कुमार शर्मा, डॉ. दुर्गेश कुमार पाठक सहित आचार्यगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।









