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ऐतिहासिक मुख्य भवन में गूंजा योग का स्वर, ज्ञान-साधना और संस्कृति के संगम का बना साक्षी संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय

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वाराणसी, 20 जून। 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित योग महोत्सव के द्वितीय दिवस विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक एवं भव्य मुख्य भवन योग, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति के अद्भुत संगम का साक्षी बना। वैदिक मंत्रोच्चार, मंगलाचरण और योग साधना से परिपूर्ण वातावरण में विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों तथा नगर के नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए योग के प्रति अपनी आस्था और प्रतिबद्धता व्यक्त की।

योग विज्ञान केंद्र के तत्वावधान में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन डॉ. दुर्गेश पाठक ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन, मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण तथा जीवन में नियमित रूप से योग अपनाने की शपथ के साथ हुई। वैदिक मंत्रों की पावन ध्वनि के बीच उपस्थित प्रतिभागियों ने स्वस्थ, संतुलित और अनुशासित जीवन के लिए योग को निरंतर अपनाने का संकल्प लिया।

इस अवसर पर योग प्रशिक्षक डॉ. राजकुमार मिश्र एवं आदित्य कुमार ने प्रतिभागियों को सूर्य नमस्कार, विभिन्न योगासनों, प्राणायाम, ध्यान तथा स्वास्थ्यवर्धक योग मुद्राओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षकों ने योग और विज्ञान के समन्वित स्वरूप की व्याख्या करते हुए बताया कि योग न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाता है, बल्कि मानसिक एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और आध्यात्मिक विकास का भी सशक्त माध्यम है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि योग भारतीय संस्कृति की आत्मा तथा समत्वपूर्ण जीवन का आधार है। उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मानुशासन, आत्मशुद्धि और आत्मबोध की दिव्य साधना है। पतंजलि योगसूत्र के प्रसिद्ध सूत्र “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि योग मनुष्य को मानसिक विक्षेपों और तनाव से मुक्त कर आंतरिक शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।

कुलपति ने भगवद्गीता के “समत्वं योग उच्यते” सिद्धांत का स्मरण कराते हुए कहा कि योग जीवन में संतुलन, संयम और समरसता स्थापित करने का सर्वोत्तम साधन है। वर्तमान प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण जीवन में योग स्वस्थ शरीर, निर्मल मन और सशक्त व्यक्तित्व के निर्माण का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे योग को केवल एक दिवस तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपनी दैनिक जीवनचर्या का अभिन्न अंग बनाएं।

कार्यक्रम के अंत में योग महोत्सव के नोडल अधिकारी डॉ. दुर्गेश पाठक ने सभी अतिथियों, प्रशिक्षकों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परम्परा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा।

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