वाराणसी। भारत भारती परिषद के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथामृत ज्ञानयज्ञ इन दिनों वैष्णव जनों के मधुर संगीत, हरिनाम संकीर्तन और भक्ति रस से सराबोर वातावरण में भव्य रूप से सम्पन्न हो रहा है। कथा स्थल पर सुमधुर वैष्णव संगीत की धुनों के बीच श्रद्धालुओं ने अलौकिक भक्तिभाव का अनुभव किया। कार्यक्रम के शुभारम्भ अवसर पर व्यासपीठ पर विराजमान श्रीधाम वृन्दावन से पधारे पं. अम्बुज कृष्ण शास्त्री, पं. सिद्धनाथ पाण्डेय, पं. कमलेश त्रिपाठी, आचार्य वीरेन्द्र मिश्र एवं कमल शर्मा सहित अन्य विद्वान आचार्यों का संस्था अध्यक्ष अशोक वल्लभदास ने अंगवस्त्र एवं पुष्पमालाओं से स्वागत व अभिनंदन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि काशीवासियों का यह परम सौभाग्य है कि महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी की कृपा से विगत 56 वर्षों से निरंतर श्रीमद्भागवत कथामृत का रसपान कराया जा रहा है।कथा के प्रारम्भ में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी द्वारा प्रतिपादित श्री पुरुषोत्तम सहस्त्र नामावली के पाठ के माध्यम से वैष्णव जनों ने तुलसी अर्पित कर भक्ति भाव व्यक्त किया।व्यासपीठ से प्रवचन करते हुए पं. अम्बुज कृष्ण शास्त्री ने कहा कि कलियुग के जीवों के कल्याण हेतु भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से महर्षि वेदव्यासजी ने श्रीमद्भागवत की रचना की। इसके वक्ता भगवान शुकदेवजी तथा श्रोता राजा परीक्षित थे। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत के श्रवण एवं मनन से मानव के समस्त विकार नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति सुनिश्चित होती है। जब अनेक जन्मों के पुण्यों का उदय होता है, तभी व्यक्ति को श्रीमद्भागवत कथा आयोजन का सौभाग्य प्राप्त होता है। इस अवसर पर प्रेरणा रासपंचाध्यायी ग्रंथ के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। बताया गया कि इस ग्रंथ की रचना महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी के पुत्र प्रभुचरण गुसाईं श्री विट्ठलनाथजी के प्राकट्य स्थल पर श्री बेटीजी की प्रेरणा से, श्री अशोक वल्लभदास के पिता स्व. बलभद्रदास अग्रवाल द्वारा कराई गई थी। जनकल्याण की दृष्टि से यह ग्रंथ वैष्णव समाज के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहा है। कार्यक्रम के दौरान ग्रंथ के संपादक राजीवन द्रविड को सम्मानित किया गया, वहीं व्यासपीठ से उपस्थित मीडिया कर्मियों का भी सम्मान कर उनके योगदान की सराहना की गई।










