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मनुस्मृति के मूल स्वरूप पर निर्णायक मंथन की तैयारी

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वाराणसी, 22 अक्टूबर। श्रीकाशी विद्वत परिषद न्यास की महत्वपूर्ण बैठक गुरुवार को श्रीविद्या मठ, केदारघाट में परमाराध्य परमधर्माधीश ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के सान्निध्य में हुई। बैठक की अध्यक्षता आचार्य कमलाकांत त्रिपाठी ने की। इसमें मनुस्मृति के मूल स्वरूप, शास्त्रीय ग्रंथों की प्रमाणिकता और पंचांग में एकरूपता स्थापित करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।

बैठक में शंकराचार्य ने मनुस्मृति को अपरिवर्तनीय बताते हुए कहा कि इसके वास्तविक स्वरूप में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति को लेकर समाज में उत्पन्न हो रहे भ्रम को दूर करने के लिए देशभर के विशिष्ट विद्वानों को आमंत्रित कर व्यापक विमर्श किया जाएगा। साथ ही पंचांगों में तिथियों को लेकर सामने आ रहे मतभेदों को दूर करने और त्योहारों के निर्धारण में एकरूपता स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।

बैठक में मनुस्मृति में संशोधन से संबंधित चर्चाओं और उससे समाज में उत्पन्न हो रही भ्रम की स्थिति पर विद्वानों ने विचार-विमर्श किया। इस विषय पर प्रमाण आधारित निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए देश-विदेश में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों और प्रकाशित संस्करणों का तुलनात्मक अध्ययन कराने का प्रस्ताव रखा गया। इसके लिए विभिन्न संग्रहालयों से प्रमाणित पांडुलिपियां मंगाने का सुझाव आचार्य सुधाकर मिश्र ने दिया।

निर्णय लिया गया कि भारतवर्ष के प्रमुख विद्वानों की विशेष बैठक बुलाई जाएगी। इसके बाद व्यापक स्तर पर सभा आयोजित कर पांडुलिपियों के मूल पाठ, भाषा और विभिन्न संस्करणों में आए अंतर का अध्ययन किया जाएगा। परिषद का उद्देश्य प्रामाणिक संदर्भों के आधार पर मनुस्मृति के वास्तविक स्वरूप को लेकर उठ रहे सवालों और भ्रम की स्थिति को स्पष्ट करना है।

बैठक में यह विषय भी उठाया गया कि स्मृतियों में संशोधन का अधिकार किसे है और इसके शास्त्रीय आधार क्या हैं। विद्वानों ने इस प्रश्न पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता जताई। उनका कहना था कि धार्मिक एवं शास्त्रीय ग्रंथों की प्रमाणिकता से जुड़े विषयों पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए मूल स्रोतों और विद्वत परंपरा का अध्ययन आवश्यक है।

बैठक में पंचांग निर्माण में सामने आ रही विसंगतियों पर भी गंभीरता से चर्चा हुई। विद्वानों ने कहा कि विभिन्न पंचांगों में तिथियों के निर्धारण को लेकर अंतर के कारण कई बार त्योहार अलग-अलग तिथियों पर मनाए जाते हैं। इससे आम लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। इस समस्या के समाधान के लिए विद्वानों के बीच समन्वय स्थापित करने और पंचांगों में एकरूपता लाने पर बल दिया गया।

शंकराचार्य ने कहा कि पंचांगों के मतभेद दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि पर्व-त्योहारों की तिथियों को लेकर समाज में व्याप्त असमंजस कम हो सके।

बैठक में परिषद की गतिविधियों और शास्त्रीय विषयों पर नियमित विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित करने का प्रस्ताव रखा गया। योगेश ब्रह्मचारी ने पत्रिका का नाम ‘विद्वन् मनोरंजिनी’ रखने का सुझाव दिया। इसके माध्यम से समय-समय पर सामने आने वाले धार्मिक, सांस्कृतिक और शास्त्रीय विषयों पर विद्वानों के विचार तथा उनके समाधान प्रकाशित किए जाएंगे।

बैठक में न्यास के अध्यक्ष डॉ. परमेश्वर दत्त शुक्ल, उपाध्यक्ष आचार्य कमलाकांत त्रिपाठी, महामंत्री आचार्य शत्रुघ्न त्रिपाठी, आचार्य सुधाकर मिश्र, प्रो. श्रीकृष्ण त्रिपाठी, उमापति उपाध्याय, पं. महेंद्र पांडेय, गिरीश पांडेय, अवधराम पांडेय, प्रो. शैलेश तिवारी, गिरीश दत्त पांडेय सहित अन्य विद्वान उपस्थित रहे।

उक्त जानकारी शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने दी है।

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