नौगढ़ (चंदौली)। दशहरा केवल रावण के पुतले का दहन करने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपी बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेने का अवसर भी है। जब तक मनुष्य अपने अंदर के क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य और हिंसा जैसे अवगुणों का त्याग नहीं करेगा, तब तक रावण दहन का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। रावण के पुतले को जलाने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर बसे रावण का दहन करना होगा। तभी विजयादशमी का पर्व सार्थक होगा। यह संदेश नौगढ़ बाजार स्थित दुर्गा माता मंदिर प्रांगण में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के दौरान कथावाचिका राघव प्रिया ने दिया।
उन्होंने कहा कि दशहरा बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। प्रत्येक वर्ष विजयादशमी पर रावण का पुतला जलाकर समाज को बुराई के अंत का संदेश दिया जाता है, लेकिन हमें यह भी विचार करना चाहिए कि क्या केवल पुतला जलाने से बुराइयां समाप्त हो जाती हैं? वास्तविक परिवर्तन तभी आएगा, जब व्यक्ति अपने आचरण में सुधार लाएगा और अपने भीतर मौजूद अवगुणों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करेगा।
राघव प्रिया ने कहा कि रावण के दस सिर को मनुष्य के भीतर मौजूद दस अवगुणों का प्रतीक माना जा सकता है। क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसी बुराइयां मनुष्य के विवेक को कमजोर करती हैं। विडंबना यह है कि व्यक्ति दूसरों की कमियां आसानी से देख लेता है, लेकिन अपने भीतर झांककर आत्ममंथन करने से बचता है। यदि हर व्यक्ति स्वयं में सुधार लाने का प्रयास करे, तो समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने पर जोर देते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन सत्य, त्याग, मर्यादा, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है। उनके आदर्शों को अपनाकर ही समाज में सद्भाव, नैतिकता और न्याय की स्थापना की जा सकती है। दूसरों के प्रति सम्मान का भाव रखना, जरूरतमंदों की सहायता करना और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना ही अच्छाई की सच्ची विजय है।
राघव प्रिया ने नारी सुरक्षा और सम्मान को सामाजिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को सम्मान देने की परंपरा रही है। ऐसे में महिलाओं के साथ हिंसा, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की घटनाएं चिंताजनक हैं। दशहरे के अवसर पर समाज को महिलाओं की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों की रक्षा का संकल्प भी लेना चाहिए।
उन्होंने रामायण के जटायु प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि माता सीता की रक्षा के लिए जटायु ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना रावण का सामना किया। यह प्रसंग सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए साहस, संवेदना और कर्तव्यबोध आवश्यक हैं। आज जरूरत है कि समाज महिलाओं की सुरक्षा को केवल चर्चा तक सीमित न रखे, बल्कि उनके सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आए। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर आवाज उठाना, पीड़ितों का साथ देना और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई का समर्थन करना प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है।
उन्होंने कहा कि दशहरे का वास्तविक संदेश तभी पूरा होगा, जब हम अपने भीतर की बुराइयों को दूर करने के साथ समाज में सत्य, सदाचार, समानता और मर्यादा को महत्व देंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण में सुधार लाए और महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने में योगदान करे, तभी बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व सही मायने में सार्थक होगा।
कथा के दौरान चकिया विधानसभा क्षेत्र के विधायक आचार्य कैलाश खरवार ने मानस पूजन किया। वहीं, कथा समिति के अध्यक्ष एवं दैनिक जागरण के पत्रकार विजय जायसवाल ने कथावाचिका राघव प्रिया का सम्मान किया। कथा में क्षेत्र की महिलाओं, बच्चों और पुरुषों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।










