वाराणसी। मालवीय भवन में आयोजित रविवासरीय गीता-प्रवचन कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रो. पतञ्जलि मिश्र ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता सम्पूर्ण मानवता के लिए जीवन-शास्त्र है, जो मनुष्य को कर्तव्य, कर्म और आत्मबोध की राह दिखाती है। उन्होंने कहा कि आज के तनावग्रस्त और भौतिकतावादी युग में गीता के उपदेश मानव समाज को नैतिकता, संतुलन और आत्मसंयम का मार्ग प्रदान करते हैं। प्रो. मिश्र ने कहा कि ईश्वर विभिन्न युगों में अलग-अलग रूपों में अवतार लेकर अपनी निःश्वासभूत वाणी वेद को समयानुसार विभिन्न शास्त्रों के रूप में अवतरित कराते हैं। कृष्णावतार में वेद का ही अवतार गीता के रूप में हुआ, जो किसी एक धर्म या वर्ग के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए मार्गदर्शक ग्रंथ है। उन्होंने कहा कि गीता का मूल संदेश कर्मयोग है, जो व्यक्ति को फल की चिंता से मुक्त होकर अपने दायित्वों के निर्वहन की प्रेरणा देता है। यदि गीता की किसी एक शिक्षा को भी जीवन में ईमानदारी से अपनाया जाए, तो जीवन दिशा, उद्देश्य और सार्थकता से भर जाता है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी कहा कि युवाओं को गीता के संदेशों से जोड़ना आज की आवश्यकता है, ताकि वे जीवन में नैतिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ सकें। कार्यक्रम के आरम्भ में अतिथियों का स्वागत प्रो. मृत्युञ्जय देव पाण्डेय ने किया। संगीत एवं मंच कला संकाय के छात्रों द्वारा भजनों की भावपूर्ण प्रस्तुति दी गई, जबकि गीता माहात्म्य का वाचन कुमारी सृष्टि ने किया। संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन गीता समिति के संयुक्त सचिव प्रो. शरदिन्दु कुमार त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर प्रो. यू.पी. शाही, प्रो. आर.जी. मलिक, प्रो. सुनील कात्यायन, डॉ. अथर्व पाण्डेय, रवीश दत्त मिश्र, अरुण कुमार पाण्डेय सहित बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के छात्र, कर्मचारी एवं प्राध्यापक उपस्थित रहे।









