नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल देखने को मिला है। 11 सितंबर को ब्रेंट क्रूड 108.07 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जो 25 मई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर है। इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड की कीमत भी बढ़कर 102.97 डॉलर प्रति बैरल हो गई। कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ तेल आयात पर निर्भर भारत की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं।
तेल कीमतों में उछाल की प्रमुख वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव माना जा रहा है। हाल के घटनाक्रमों के बाद क्षेत्र में सैन्य टकराव बढ़ने की आशंका गहरा गई है। ईरान की ओर से अमेरिकी हमलों के जवाब में जॉर्डन में अमेरिकी युद्धपोतों पर मिसाइल हमले किए जाने की खबरों ने बाजार की चिंता बढ़ाई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और ईरान की जवाबी कार्रवाई की चेतावनी के बीच निवेशकों में आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे सऊदी अरब में उत्पादन में आई गिरावट भी अहम कारक है। हूती विद्रोहियों की धमकियों के बीच सऊदी अरब में कच्चे तेल का उत्पादन इस वर्ष के निचले स्तर तक पहुंचने की बात सामने आई है। पश्चिमी बंदरगाहों से गुजरने वाले तेल टैंकरों को निशाना बनाने की धमकी ने आपूर्ति संबंधी चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
वहीं, दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक चीन की ओर से तेल खरीदारी में तेजी ने भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग का दबाव बढ़ाया है। भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच चीन की बढ़ती खरीदारी से कीमतों को और समर्थन मिला

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत के लिए आर्थिक चिंता का विषय बन सकती है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर व्यापार घाटे तथा महंगाई पर भी पड़ने की आशंका रहती है।










