वाराणसी। रंगभरी एकादशी महोत्सव को लेकर काशी में परंपरा और प्रशासन के बीच विवाद गहराता दिख रहा है। पूर्व महंत लोकपति तिवारी ने आरोप लगाया है कि इस वर्ष भी मंदिर प्रशासन द्वारा बाबा विश्वनाथ की प्राचीन रजत चल प्रतिमा को पूजन हेतु मंदिर प्रांगण में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा रही है, जिससे सदियों पुरानी परंपरा प्रभावित हो रही है।
लोकपति तिवारी ने बताया कि मंदिर प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि इस बार भी तथाकथित नई प्रतिमा, जो टेढ़ीनीम पर स्थापित की गई है, उसी से पालकी यात्रा निकालकर गर्भगृह में पूजन की व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने इसे काशी की प्राचीन धार्मिक परंपरा के विपरीत बताया।
पूर्व महंत ने कहा कि 17 फरवरी को पत्रकार वार्ता के बाद उन्होंने जिले के वरिष्ठ अधिकारियों से इस विषय पर वार्ता की थी। उनके अनुसार अधिकारियों ने “शासन के दबाव” का हवाला देते हुए प्राचीन रजत चल प्रतिमा को मंदिर में मंगाकर पूजन कराने में असमर्थता जताई।

लोकपति तिवारी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से विनम्र अपील करते हुए कहा कि काशी जैसी पौराणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक नगरी में परंपराओं का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। उन्होंने मांग की कि चाहे आयोजन टेढ़ीनीम से हो या बड़ा देव स्थित उनके आवास से, लेकिन रंगभरी एकादशी की ऐतिहासिक परंपरा बाबा की प्राचीन रजत चल प्रतिमा से ही संपन्न कराई जाए, क्योंकि काशीवासियों की आस्था उसी से जुड़ी है।
उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं में किसी प्रकार का परिवर्तन जनभावनाओं को आहत कर सकता है। पत्रकार वार्ता में ब्रजपति तिवारी सहित अन्य श्रद्धालु और समर्थक भी उपस्थित रहे।
रंगभरी एकादशी काशी में विशेष धार्मिक महत्व रखती है, जिसमें बाबा विश्वनाथ के गौरा-गौरी स्वरूप का उत्सवपूर्वक स्वागत किया जाता है। ऐसे में प्रतिमा को लेकर उठा यह विवाद आने वाले दिनों में और चर्चा का विषय बन सकता है।









