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लोकगीतों में समाहित है भारतीय संस्कृति की आत्मा – डॉ. श्रुति उपाध्याय

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वाराणसी। आकाशवाणी वाराणसी केंद्र में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की सहायक प्रवक्ता (संगीत गायन) डॉ. श्रुति उपाध्याय ने “लोकगीतों की पोटली को सहेजती संस्कृति” विषय पर गायन सहित प्रभावशाली व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने लोक संस्कृति की विशेषताओं, उसके विकास, वर्तमान समय में उसकी स्थिति तथा भविष्य में संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की।

डॉ. श्रुति उपाध्याय ने कहा कि लोकगीतों में भारतीय संस्कृति की आत्मा समाहित है। लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मानव मन की भावनाओं के सहज प्रकटीकरण का सशक्त साधन हैं। इनमें कहीं विरह की पीड़ा, कहीं हर्षोल्लास तो कहीं गहन भक्ति भावना की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। उन्होंने बताया कि लोकगीतों में गायन की अनेक विधाएँ विद्यमान हैं, जो हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं।

उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि नई पीढ़ी को लोकगीतों से जोड़ना समय की आवश्यकता है, ताकि हमारी समृद्ध लोक परंपराएं संरक्षित रह सकें और आधुनिक दौर में भी जीवंत बनी रहें।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी डॉ. श्रुति उपाध्याय के निर्देशन में संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे कई छात्र-छात्राओं ने वसंत पंचमी के अवसर पर आकाशवाणी वाराणसी से संगीतमय प्रस्तुति दी है। इसके अतिरिक्त काशी सांसद सांस्कृतिक महोत्सव में भी उनके मार्गदर्शन में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संगीत विभाग के छात्र-छात्राओं ने विश्वविद्यालय स्तर एवं जिला स्तर पर विजय प्राप्त कर संस्थान का नाम गौरवान्वित किया है।

इन उल्लेखनीय उपलब्धियों पर परिवार एवं शुभचिंतकों में हर्ष का वातावरण है तथा डॉ. श्रुति उपाध्याय को निरंतर बधाइयाँ दी जा रही हैं।

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