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77वें गणतंत्र दिवस समारोह में कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने ऐतिहासिक मुख्य भवन से किया ध्वजारोहण, “यह दिन त्याग, तपस्या, समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक है” — कुलपति

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वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में देश का 77वां गणतंत्र दिवस गरिमामय एवं राष्ट्रभक्ति के वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक मुख्य भवन के समक्ष कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने ध्वजारोहण किया तथा उपस्थित शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को संबोधित किया।

कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि गणतंत्र दिवस युवाओं के लिए कोई साधारण दिन नहीं है, बल्कि यह त्याग, तपस्या, समर्पण और कृतज्ञता का स्मरण कराने वाला दिवस है। उन्होंने कहा कि आज भारत भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी अग्रसर है, जिसका प्रमुख केंद्र काशी है।

उन्होंने काशी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि बाबा विश्वनाथ, उत्तरवाहिनी मां गंगा और संस्कृत काशी की आत्मा हैं। इसी महत्व को समझते हुए 1791 में ब्रिटिश शासनकाल में बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना हुई, जो आज सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। विश्वविद्यालय को नैक से ‘ए’ ग्रेड मिलना यहां के कर्मठ आचार्यों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों की उपलब्धि है।

कुलपति ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एक लंबी और गौरवशाली गाथा है। 26 जनवरी 1930 को लाहौर में रावी तट पर स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा लिए गए संकल्प से लेकर 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने तक का सफर देश के संघर्ष और संकल्प का प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि संविधान सभा ने लगभग 2 वर्ष 11 माह 18 दिन के विमर्श के बाद 26 नवंबर 1949 को संविधान का निर्माण किया, जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू कर भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया गया।

प्रो. शर्मा ने कहा कि आज जहां दुनिया बूढ़ी हो रही है, वहीं भारत जवान हो रहा है। भारत की युवा शक्ति पर देश को गर्व और भरोसा है और आने वाला समय भारत की दिशा में ही आगे बढ़ेगा।

कुलपति ने सरकार से अनुरोध किया कि संस्कृत की रक्षा एवं संवर्धन करने वाली यह प्राचीन संस्था अभी तक केन्द्रीय दर्जा प्राप्त नहीं कर सकी है, जबकि इसके बाद स्थापित तीन विश्वविद्यालयों को यह दर्जा मिल चुका है। अतः सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा दिया जाना आवश्यक है।

कुलपति ने कहा कि तिरंगा भारत की आत्मा, चेतना और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। उन्होंने सभी से अपने-अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करने का आह्वान करते हुए कहा कि कर्तव्यपरायणता ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।

कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रान्त कार्यवाह वीरेन्द्र जायसवाल ने कहा कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही देश को एक सशक्त शासन व्यवस्था मिली। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस, अन्य दलों, क्रांतिकारियों एवं समाजसेवियों के योगदान को स्मरण किया।इस अवसर पर कुलपति एवं मुख्य अतिथि द्वारा डॉ. मधुसूदन मिश्र, शशीन्द्र मिश्र, कौशल झा, प्रदीप कुमार शर्मा, शालिनी पांडेय, अंकुर उपाध्याय एवं डूंगर शर्मा को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

समारोह के प्रारम्भ में कुलपति ने एनसीसी परेड का निरीक्षण, भारत माता के चित्र तथा महात्मा गांधी एवं पं. नेहरू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया। ध्वजारोहण के पश्चात सामूहिक राष्ट्रगान हुआ। संगीत विभाग द्वारा कुलगीत एवं ध्वज वंदना प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम में कुलसचिव राकेश कुमार सहित विश्वविद्यालय के अनेक आचार्य, अधिकारी, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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