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…तो जावेद साहब के चोचले से ईमान की सुसाइड 

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….तो जावेद साहब के चोचले से ईमान की सुसाइड

एम. नसीम

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बेशक हर एक जुर्म का इन्तिहा है। अल्लाह अपने बंदों पर इतना अत्याचार होते नहीं देख सकता है जो उसके बर्दास्त के बाहर हो। यह अल्लाह का कलाम है। जिसे कुरान शरीफ में अल्लाह ने फरमाया है। उसी कुरान में अल्लाह ने जालिम और नाफरमानों पर भी कई जगह फरमाता है मेरे इंसाफ में रत्ती भर भी चूंक नहीं होगी । बाल से भी बारीक मेरा फैसला होगा। यह बात गीतकार जावेद साहब भी जानते है। इसलिए कि अदब से लेकर बहादुरी तक में उनके पुरखों की सर-जमीन-ए-हिन्दुस्तान पर वफादारी के सबूत तवारीख मे जिन्दा जावेद है। जनाब जावेद साहब के बयान के जो भाव है बेहद तकलीफदेह हालात से उपजे हो सकते हैं। इसलिए कि वह हिन्दू और मुसलमान की बात से हमेशा से ही गुरेज करते हैं। हमेशा से मानवता के सच्चे प्रहरी रहे हैं। मेरा मानना है कि जावेद साहब का बयान एक ऐसा बयान है जो असहनीय पीडा के बाद दिल-ओ-जेहन में बसे रहते हैं। यही नहीं एक अदबी शख्सियत ऐसे बयान दे तो चौंकना भी लाजमी है। मगर उस बयान की गहराइयों में भी दखल रखना जरूरी है। बात गाजा के निरिह बच्चों पर जुल्म-ओ-सितम की करें और उस विषय पर मंथन करें तो बङीं बात यह निकलती है कि 56 इस्लामिक स्टेट इस्लाम या मुसलमान के नाम पर भी इस खूनी संघर्ष को तमाशा बनाकर देख रहे थे। इन्सानियत कराह रही थी जुल्म और दरिन्दगी की इबारत ही लिखा रही थी। मुस्लिम देश सिर्फ गिदङ भभकी देते रहे। ऐसे हालात में उनके भी यही बोल हो सकते हैं जो जावेद साहब के हैं । इस बात को भी गौर करना चाहिए कि आस्था पर जब तगङी चोट लगती है तो इन्सान ही नहीं आत्मा भी कराह उठती है। कोई सहारा या फिर बचाव अथवा ऐसा कुछ न होने पर व्यक्ति को जीवन ही अंधेरा नजर आता है। एक अंतिम रास्ता ईश्वर में अडिग विश्वास का बचता है। जब सर्वशक्तिमान की ओर से भी कुछ नहीं होता तो इन्सान नास्तिक हो जाता है। अंततः वह अपने ईमान की आत्महत्या कर बैठता है। कहीं ऐसा तो नहीं वही कार्य जावेद साहब भी कर बैठे हैं ? मगर विद्वान व्यक्ति इतना विचलित तो कदापि नहीं होता है। जावेद साहब किसी भी धर्म में देखें तो इसका उदाहरण मिलता है कि युद्ध में छल-बल और कल सारे हथकंडे आजमाये जाते है। उन्हें जंग-ए-बद्र से लेकर कर्बला तक कि जंग पर तफ्सील से नजरियात भी रखना चाहिए। यही नहीं जावेद साहब को फिरौन और यजीद ही नहीं रावण के भी अध्ययन करने की आवश्यकता है। मैं मानता हूं कि आप अदब के माहिर और जहीन व्यक्तित्व के हैं लेकिन लगता है कि यह व्यक्तित्व भी पेशेवराना ही है। यही नहीं मानवीय संवेदना भी एक दिखावा और राष्ट्रभक्ति आपका चोचलापन है। यह मैं नहीं कह रहा हूं इसका प्रमाण आपके ही बयान है। जिसे मैं लिखना भी बेहतर नहीं समझता हूूं ।

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