नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को स्पष्ट और कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि यदि किसी आपराधिक मामले में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, तो न्यायालयों को साहस दिखाते हुए ट्रायल शुरू होने से पहले ही मामले को खारिज कर देना चाहिए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक प्रक्रिया स्वयं किसी व्यक्ति के लिए सजा का रूप नहीं लेनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय करोल ने कहा कि आपराधिक मुकदमे की लंबी प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति के लिए सामाजिक कलंक, मानसिक तनाव और पेशेवर जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। ऐसे में अदालतों का दायित्व है कि वे मामलों की प्रारंभिक चरण में ही गंभीरता से जांच करें और कमजोर या आधारहीन मामलों को आगे न बढ़ने दें।
पीठ ने यह भी कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अभियोजन चलाना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है। यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो न्यायालयों को धारा के अनुरूप अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए आरोपमुक्त करने या कार्यवाही समाप्त करने पर विचार करना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगी और इससे अनावश्यक मुकदमों में कमी आने की संभावना है। इससे न्यायालयों पर लंबित मामलों का बोझ भी कम हो सकता है तथा निर्दोष व्यक्तियों को बेवजह लंबी कानूनी प्रक्रिया से राहत मिल सकेगी।









