वाराणसी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘बौड़म’ तथाकथित सभ्य समाज की संवेदनहीनता, दोहरे मानदंडों और नैतिक पतन पर करारा व्यंग्य है। यह कहानी किसी एक व्यक्ति के पागलपन की नहीं, बल्कि पूरे समाज के बौद्धिक पागलपन को उजागर करती है। उक्त विचार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह ने प्रेमचंद की जन्मस्थली (स्मारक) लमही में आयोजित ‘सुनो मैं प्रेमचंद’ कार्यक्रम के 1791वें दिवस पर व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानी ‘बौड़म’ का सशक्त पाठ वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मिश्रा ‘हर्ष’ ने किया। पाठन के उपरांत उन्हें ट्रस्ट के संरक्षक प्रो. श्रद्धानंद, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह, नरेंद्र नाथ मिश्र, गीतकार हिमांशु उपाध्याय एवं निदेशक राजीव गोंड द्वारा सम्मानित किया गया। इसी अवसर पर समाजसेवी अंजनी कुमार सिंह को साहित्य और सामाजिक सरोकारों में सक्रिय सहभागिता के लिए ‘प्रेमचंद मित्र सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान डॉ. राम सुधार सिंह, प्रो. श्रद्धानंद और हिमांशु उपाध्याय ने संयुक्त रूप से प्रदान किया। डॉ. राम सुधार सिंह ने कहा कि ‘बौड़म’ कहानी में नैतिकता और चालाकी के बीच का द्वंद्व अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरता है, जहाँ नैतिकता हारती और चालाकी जीतती दिखाई देती है। यही प्रेमचंद के यथार्थवादी दृष्टिकोण की सशक्त अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद इस कथा के माध्यम से ‘पागलपन’ की सामाजिक परिभाषा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। प्रो. श्रद्धानंद ने कहा कि कहानी का केंद्रीय पात्र ‘बौड़म’ वह व्यक्ति है जिसे समाज मानसिक रूप से असंतुलित मानकर हाशिये पर डाल देता है, जबकि वास्तविक बौड़म वही समाज है जो अन्याय, छल और स्वार्थ को सामान्य मान लेता है। हिमांशु उपाध्याय ने कहा कि बौड़म की सरलता, स्पष्टवादिता और नैतिक साहस ही उसे समाज से अलग करता है और यही अलगाव उसे ‘पागल’ का तमगा दिला देता है। वहीं नरेंद्र नाथ मिश्र ने बौड़म के चरित्र को अत्यंत मार्मिक बताते हुए कहा कि समाज में सबसे अधिक शोषण उन्हीं लोगों का होता है जो चालाक नहीं होते। कार्यक्रम में अशफ़ाक सिद्दीकी, समाजसेवी अरविंद विश्वकर्मा, अश्विवित दूबे, नमन श्रीवास्तव, प्रांजल श्रीवास्तव, रामजतन पाल, वाचस्पति चतुर्वेदी, मृत्युंजय मिश्रा, अंजलि रावत, शौरभ वर्मा, सचिन शुक्ल, शंकर श्रीवास्तव, यश वर्मा, उत्कर्ष वर्मा, अभिषेक मौर्य, रतनशीला, सूर्यदीप कुशवाहा, राहुल यादव, रोहित गुप्ता, विपनेश सिंह, संजय श्रीवास्तव, राधेश्याम पासवान सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन आयुषी दूबे ने किया। स्वागत भाषण अशोक पाण्डेय ने प्रस्तुत किया तथा धन्यवाद ज्ञापन वाचस्पति चतुर्वेदी ने किया।









