वाराणसी। उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ‘1008’ ने नव संवत्सर ‘रौद्र’ (विक्रमी 2083) के पावन अवसर पर समस्त सनातन धर्मावलंबियों के नाम अपना वार्षिक संदेश जारी किया। अपने संदेश में उन्होंने ज्योतिष्पीठ पर आसीन होने के साढ़े तीन वर्षों के कार्यकाल का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए राष्ट्र, समाज, राजनीति और वैश्विक परिस्थितियों पर धर्मसम्मत दिशा-निर्देश दिए।
शंकराचार्य जी ने बताया कि 12 सितम्बर 2022 को पीठ का दायित्व ग्रहण करने से लेकर 19 मार्च 2026 तक कुल 1284 दिन (3 वर्ष, 6 माह, 1 सप्ताह, 4 दिन, 15 घंटे, 38 मिनट) का समय धर्म, संस्कृति और लोककल्याण के लिए समर्पित रहा।
इस अवधि की प्रमुख उपलब्धियों में काशी के निकट 1008 एकड़ में प्रस्तावित ‘जगद्गुरुकुलम्’ का निर्माण, छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में ‘सवा लाख शिवलिंग मंदिर’ का अंतिम चरण, 50 से अधिक विरक्त शिष्यों का निर्माण तथा देशभर में 2 लाख किलोमीटर से अधिक की धर्म-जागृति यात्राएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त गौ-प्रतिष्ठा अभियान के अंतर्गत 6 करोड़ आहुतियों वाला महायज्ञ, ध्वज स्थापना यात्राएं और वृंदावन से दिल्ली तक पदयात्रा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से व्यापक जन-जागरण किया गया।

राजनीतिक संदर्भ में शंकराचार्य जी ने स्पष्ट कहा कि अब हिंदू समाज केवल ‘वोट बैंक’ नहीं रहेगा। उन्होंने ‘गो-मतदाता’ बनने का आह्वान करते हुए कहा कि वही जनप्रतिनिधि सनातनी समर्थन के पात्र होंगे जो गौ-माता को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा देने और गोवंश हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध का साहस दिखाएंगे।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अमेरिका-ईरान तनाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत को रेखांकित किया और कहा कि किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता पर आक्रमण अधर्म है। उन्होंने विश्व शांति और संतुलन के लिए शास्त्रसम्मत आचरण की आवश्यकता बताई।
नव संवत्सर ‘रौद्र’ को ‘गविष्ठि वर्ष’ घोषित करते हुए शंकराचार्य जी ने उत्तर प्रदेश में 81 दिवसीय गविष्ठि यात्रा तथा ‘गोरक्षा धर्मयुद्ध’ की घोषणा की। इसके लिए ‘शंच’ (शंकराचार्य चतुरंगिणी) नामक संगठन के गठन का भी ऐलान किया गया, जो गौ-संरक्षण के लिए समर्पित रहेगा।
इस अवसर पर शंकराचार्य जी ने ‘सनातनी पंचांग’ का विमोचन भी किया। वहीं ‘प्रातर्मंगलम्’ के 20वें वार्षिकोत्सव पर शंकराचार्य घाट पर बटुकों द्वारा नववर्ष के प्रथम सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया गया। नवरात्रि तक श्रीविद्यामठ में उनके सान्निध्य में विशेष पूजन-अर्चन का आयोजन भी किया जाएगा। अंत में पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने समस्त देशवासियों को नव संवत्सर की मंगलकामनाएं प्रेषित कीं।









