वाराणसी, 22 फरवरी 2026। भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल चेतना को पुनर्स्मरण कराते हुए सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या विभाग में व्याकरण शास्त्र के व्यावहारिक एवं दार्शनिक आयामों पर एक गरिमामयी शास्त्रसंगोष्ठी का आयोजन संपन्न हुआ। शास्त्रीय गंभीरता और आधुनिक दृष्टि के समन्वय से युक्त इस संगोष्ठी ने उपस्थित विद्वानों एवं विद्यार्थियों को गहन बौद्धिक विमर्श का अवसर प्रदान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि “व्याकरण वेदांगों में प्रधान शास्त्र है और यह समस्त शास्त्रों का आधार है। शब्द ही ब्रह्म है, अतः शब्द का यथार्थ ज्ञान मनुष्य को ब्रह्मविद्या की ओर अग्रसर करता है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन की समस्त परंपराएं शब्द की शुद्धता और अर्थ की प्रमाणिकता पर आधारित हैं, और इस दृष्टि से व्याकरण केवल भाषा का अनुशासन नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रवेशद्वार है।
कुलपति ने यह भी आश्वासन दिया कि विश्वविद्यालय में प्रत्येक माह आयोजित होने वाली शास्त्रसंगोष्ठियों के लिए सभी आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी, जिससे शास्त्रीय चिंतन-परंपरा सतत सशक्त होती रहे। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का दायित्व केवल शिक्षण तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का भी है।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता संस्कृत भारती के विश्वविद्यालय शिक्षण प्रमुख डॉ. नितिन आर्य ने अपने व्याख्यान में पाणिनि विरचित अष्टाध्यायी के वैज्ञानिक स्वरूप को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रत्येक अध्याय से एक-एक सूत्र का उदाहरण देकर यह सिद्ध किया कि व्याकरण शास्त्र उतना दुरूह नहीं है, जितना सामान्यतः समझा जाता है।
डॉ. आर्य ने कहा कि आचार्य पाणिनि मूलतः एक महान भाषावैज्ञानिक थे, जिन्होंने संस्कृत वाङ्मय में निहित अनंत शब्दों के साधुत्व-निर्णय हेतु लगभग चार हजार सूत्रों की रचना की। उनका व्याकरण लौकिक एवं वैदिक दोनों प्रकार के शब्दों का साधुत्व स्थापित करता है तथा समाज को शास्त्रनिहित शब्दार्थ का यथार्थ बोध कराता है।
उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि पाणिनीय व्याकरण केवल भाषिक संरचना का विश्लेषण नहीं, बल्कि तर्क, गणितीय संरचना और ध्वनिविज्ञान का अद्भुत समन्वय है। आधुनिक भाषाविज्ञान जिन सिद्धांतों पर आज कार्य कर रहा है, उनका बीजारोपण सहस्रों वर्ष पूर्व भारतीय मनीषा द्वारा किया जा चुका था।
शास्त्रवेत्ताओं के मतानुसार पाणिनि-प्रणीत व्याकरण समस्त शास्त्रों का उपकारक है। व्याकरण का प्रयोजन केवल शब्दार्थ-ज्ञान तक सीमित नहीं, अपितु वेदान्त के समान मोक्षमार्ग को भी प्रशस्त करना है। यह मान्यता आज भी प्रासंगिक है कि एक शब्द के साधुत्व का सम्यक् ज्ञान मनुष्य को इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण प्रदान करता है।
इटली की एमबीबीएस छात्रा एन्तोनेला ने व्याकरण एवं विज्ञान के पारस्परिक संबंधों को सरल और प्रभावी शैली में प्रस्तुत करते हुए कहा कि संस्कृत व्याकरण की संरचना में वैज्ञानिक अनुशासन और तार्किक क्रमबद्धता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उन्होंने कहा कि भाषा के सूक्ष्म नियमों की समझ से चिंतन-शक्ति और विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास होता है, जो किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन के लिए अनिवार्य है।
कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विद्या विभाग के आचार्य डॉ. रविशंकर पाण्डेय ने किया। उन्होंने विद्यार्थियों के लिए व्याकरण-ज्ञान के व्यावहारिक स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि संस्कृत के छात्रों के लिए व्याकरण का ज्ञान अनिवार्य है, क्योंकि यही शास्त्र अध्ययन की आधारशिला है।
धन्यवाद ज्ञापन छात्रकल्याण संकायाध्यक्ष प्रो. शैलेश कुमार मिश्र द्वारा किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं सूचना एवं ग्रंथालय विज्ञान विभाग के अध्यक्ष हीरककांति चक्रवर्ती, सामाजिक विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष एवं पुस्तकालयाध्यक्ष प्रो. राजनाथ, तथा वेद विभाग के विद्वान डॉ. सत्येंद्र यादव सहित अनेक प्राध्यापक उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर सहभागिता की। अनेक विद्यार्थियों द्वारा शोध-पत्र वाचन किया गया, जिनमें व्याकरण शास्त्र के व्यावहारिक एवं समसामयिक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया।
समग्र रूप से यह संगोष्ठी भारतीय शास्त्रीय परंपरा के पुनरुत्थान की दिशा में एक ऐतिहासिक और प्रेरक कदम सिद्ध हुई, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि व्याकरण केवल भाषा का अनुशासन नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की आधारशिला है।









