प्रयागराज। आस्था, साधना और त्याग की भूमि माघ मेले में इस बार वैराग्य के साथ वैभव का अनोखा दृश्य देखने को मिल रहा है। करोड़ों रुपये की लग्जरी गाड़ियों के साथ पहुंचे जगद्गुरु संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा मेले में चर्चा का प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।
लैंड रोवर डिफेंडर और करीब तीन करोड़ रुपये से अधिक कीमत की पोर्शे कार के साथ सतुआ बाबा का काफिला जहां भी पहुंचा, वहीं श्रद्धालुओं की निगाहें ठहर गईं। मेला क्षेत्र स्थित उनके शिविर में पोर्शे कार का विधि-विधान से पूजन किया गया, जिसे देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ी।
त्याग, तप, योग और जप का संदेश देने वाले संत की इस आधुनिक जीवनशैली ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। समर्थक इसे गुरु कृपा और साधना का प्रतिफल बता रहे हैं, जबकि आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि सांसारिक मोह त्यागने वाले संतों को इतना वैभव क्यों भाता है।

सतुआ बाबा के अनुसार यह कार देश में केवल 110 लोगों के पास है और वे इसके 111वें स्वामी हैं। उनके पास डिफेंडर, फॉर्च्यूनर, इनोवा, बोलेरो, स्कॉर्पियो एन सहित करीब दस लग्जरी वाहन बताए जाते हैं।
काशी से प्रयागराज तक पहचान
काशी के मणिकर्णिका घाट स्थित सतुआ बाबा पीठ की स्थापना वर्ष 1803 में हुई थी। इसी पीठ के वर्तमान प्रमुख संतोष दास महज 11 वर्ष की उम्र में घर त्यागकर काशी पहुंचे और 19 वर्ष में महामंडलेश्वर बने—जो अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाती है।
सिक्के का दूसरा पहलू
माघ मेले में जहां यह वैभव चर्चा में है, वहीं कई ऐसे संत भी मौजूद हैं जो आज भी अन्न त्याग, कुटिया वास और पैदल गंगा स्नान जैसी कठोर तपस्या में लीन हैं। यही माघ मेला अध्यात्म के विविध स्वरूपों का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है।
फिलहाल, माघ मेले में सतुआ बाबा और उनकी लग्जरी गाड़ियां आस्था और आधुनिकता के संगम का प्रतीक बनकर सबसे अधिक चर्चा में हैं।









