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माघी पूर्णिमा : भारतीय सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा का महापर्व — कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा

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वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने माघी पूर्णिमा पर्व के अवसर पर जन-सामान्य को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय सनातन परम्परा में माघी पूर्णिमा धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना एवं सामाजिक समरसता का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा पुण्यदायक पर्व है। यह पर्व माघ मास के पुण्यकाल में सम्पन्न होता है, जिसे शास्त्रों में “माघमासो महापुण्यप्रदायकः” कहकर विशेष महिमा प्रदान की गई है।

कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि माघी पूर्णिमा केवल गंगा-स्नान, दान, जप, तप और व्रत का अवसर मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकजीवन में करुणा, दया, सेवा और समत्व की भावना को सुदृढ़ करने वाला महापर्व है। इस दिन संगमों, तीर्थों एवं पवित्र नदियों में स्नान कर दान-पुण्य करने से आत्मिक शुद्धि के साथ लोक-कल्याण की भावना जाग्रत होती है।

उन्होंने बताया कि धर्मशास्त्रों के अनुसार माघी पूर्णिमा के दिन किया गया स्नान-दान सहस्रगुणित फल प्रदान करता है। विशेष रूप से अन्नदान, वस्त्रदान, तिलदान, घृतदान एवं स्वर्णदान का अत्यधिक महत्त्व बताया गया है। यह पर्व साधना, संयम और आत्मानुशासन की परम्परा को पुष्ट करता है तथा शास्त्रीय मान्यता के अनुसार इस दिन किया गया पुण्यकर्म जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की सिद्धि में सहायक होता है।

कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि माघी पूर्णिमा का सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्ष भी अत्यन्त व्यापक है। यह पर्व समाज में सामूहिकता, सेवा-भाव और लोकमंगल की चेतना को जाग्रत करता है। ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में आयोजित मेले, धार्मिक सभाएँ, प्रवचन, भण्डारे एवं सेवा-कार्य इस पर्व को सांस्कृतिक एकात्मता और सामाजिक सहभागिता के उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

उन्होंने विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग द्वारा प्रदत्त प्रामाणिक गणनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 2026 में माघी पूर्णिमा का विशेष पुण्ययोग दिनांक 01 फरवरी 2026 (रविवार) को सूर्योदय से प्रभावी रहेगा। धर्मशास्त्रीय सिद्धान्त—

“यां तिथिं समनुप्राप्य उदयं याति भास्करः।

सा तिथिः सकला ज्ञेया स्नान-दान-जपादिषु॥”

के अनुसार यह तिथि स्नान-दान, जप एवं पुण्यकर्म के लिए अत्यन्त प्रशस्त मानी गई है।

पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 01 फरवरी 2026 को प्रातः 05:53 बजे होगा, जबकि पूर्णिमा तिथि की समाप्ति 02 फरवरी 2026 को प्रातः 03:39 बजे होगी। इस प्रकार कुल 21 घंटे 46 मिनट का श्रेष्ठ पुण्यकाल प्राप्त हो रहा है।

धर्मशास्त्रीय दृष्टि से माघी पूर्णिमा के स्नान-दान काल का वर्गीकरण करते हुए उन्होंने बताया कि 01 फरवरी 2026 को प्रातः 05:53 से 10:59 तक का समय सर्वश्रेष्ठ काल, 11:00 से 15:56 तथा 01/02 फरवरी की संध्या 18:14 से प्रातः 03:39 तक का समय उत्तम काल तथा 01 फरवरी को 15:57 से 17:26 एवं 02 फरवरी को प्रातः 03:40 से 06:41 तक का समय मध्यम काल माना गया है।

विशेष ज्योतिषीय संयोग की जानकारी देते हुए कुलपति प्रो. शर्मा ने कहा कि इस वर्ष सूर्य के मकर राशि में तथा चन्द्रमा के कर्क राशि में पुनर्वसु नक्षत्र में स्थित होने से अत्यन्त पुण्यप्रद योग का निर्माण हो रहा है। विशेष रूप से 01 फरवरी 2026 को प्रातः 05:53 से 10:59 तक पुनर्वसु नक्षत्र एवं प्रीति योग के कारण स्नान-दान का फल कई गुणा बढ़ जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण तिथि में प्राप्त 21 घंटे 46 मिनट का समय अत्यन्त श्रेष्ठ एवं दुर्लभ पुण्यकाल है।

अंत में कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे माघी पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर शास्त्रीय विधि से स्नान-दान, जप-तप एवं सेवा-कार्य कर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आत्मसात करें तथा समाज में धर्म, सद्भाव, सामाजिक समरसता और मानवीय करुणा के विस्तार में सक्रिय सहभागिता निभाएँ।

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