वाराणसी। स्वयं को ‘असली हिन्दू’ सिद्ध करने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिए गए 40 दिनों के अल्टीमेटम में से 20 दिन पूरे होने के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आयोजित पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि बीते 20 दिनों में मुख्यमंत्री की ओर से हिन्दू आचरण के कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले, बल्कि “कालनेमि जैसे संकेत” ही दिखाई दिए हैं।
उन्होंने कहा कि जनमानस का मत है कि किसी विरक्त संत या महंत को धर्मनिरपेक्ष पद पर पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सन्यास की मर्यादा के विपरीत है। गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले किसी भी योगी या संन्यासी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मांस व्यापार जैसी गतिविधियों से जुड़ना सर्वथा अनुचित और अधार्मिक है।
शंकराचार्य ने समस्त अखाड़ों, महामंडलेश्वरों और महंतों से आह्वान किया कि वे आगे आकर शास्त्रसम्मत तर्कों के आधार पर इन कृत्यों की व्याख्या करें। उन्होंने प्रश्न उठाया कि यदि ये कार्य शास्त्रसम्मत सिद्ध नहीं किए जा सकते, तो उन्हें ढोंग की श्रेणी में क्यों न रखा जाए। उनके अनुसार अब संत समाज को इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रतीक्षा के इन 20 दिनों में सरकार ने ‘गोदान’ फिल्म को टैक्स-फ्री करने जैसा प्रतीकात्मक कदम तो उठाया, लेकिन ‘गाय को राज्य माता घोषित करने’ और ‘गो-मांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध’ जैसी मुख्य मांगों पर कोई निर्णय नहीं लिया। उनका तर्क था कि मनोरंजन को कर-मुक्त करने से गोवंश की रक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, बल्कि इसके लिए ठोस नीतिगत निर्णय आवश्यक हैं।
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि धर्मपीठ की प्रामाणिकता किसी राजकीय प्रमाण-पत्र की मोहताज नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री से सदन में दूसरों पर प्रश्न उठाने के बजाय स्वयं के आचरण पर स्पष्टीकरण देने की अपेक्षा जताई।
अंत में उन्होंने देशभर के गोभक्तों से 11 मार्च को लखनऊ पहुंचकर आंदोलन को गति देने का आह्वान किया और कहा कि गोमाता को अधिकार दिलाए बिना यह अभियान थमने वाला नहीं है।









