चंदौली। सैदूपुर। बरहुआ गांव में करीब 70 वर्षों से चली आ रही पारंपरिक दंगल प्रतियोगिता इस वर्ष लगातार बारिश के चलते आयोजित नहीं हो सकी। दंगल स्थल पर जलभराव और कीचड़ की स्थिति बनने के कारण अखाड़े में कुश्ती कराना संभव नहीं हुआ। हालांकि, आयोजन समिति ने परंपरा की निरंतरता बनाए रखते हुए विभिन्न स्थानों से पहुंचे पहलवानों का सम्मान किया।
बरहुआ का यह पारंपरिक दंगल क्षेत्र की पुरानी और लोकप्रिय सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है। बताया जाता है कि इसका शुभारंभ स्वर्गीय पंडित सुख सागर दूबे ने किया था। तभी से प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता में आसपास के गांवों के साथ ही दूर-दराज के क्षेत्रों से भी पहलवान पहुंचते रहे हैं। दंगल ग्रामीण अंचल में खेल भावना, आपसी सौहार्द और पारंपरिक कुश्ती संस्कृति का प्रमुख आयोजन माना जाता है।
इस वर्ष भी दंगल में भाग लेने के लिए विभिन्न स्थानों से पहलवान पहुंचे, लेकिन लगातार हो रही बारिश के कारण अखाड़े की स्थिति खराब हो गई। मैदान में पानी और कीचड़ भर जाने से कुश्ती प्रतियोगिता को स्थगित करना पड़ा। ऐसे में आयोजन समिति ने पहलवानों को सम्मानित कर उनका उत्साह बढ़ाया और सात दशक पुरानी परंपरा को प्रतीकात्मक रूप से आगे बढ़ाया।
ग्रामीणों ने कहा कि बरहुआ का दंगल महज कुश्ती प्रतियोगिता नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इस बार अखाड़े में दांव-पेच देखने को नहीं मिले, लेकिन पहलवानों के सम्मान के जरिए आयोजन की गरिमा और परंपरा को कायम रखने का प्रयास किया गया। प्रकृति ने भले ही इस बार कुश्ती पर विराम लगा दिया, लेकिन बरहुआ के दंगल से जुड़ी सात दशक पुरानी परंपरा को टूटने नहीं दिया गया।











