वाराणसी। काशी प्रवास पर आए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत में बटुक अपमान प्रकरण को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पूरे देश ने देखा है कि किस तरह बटुकों की चोटी पकड़कर उन्हें अपमानित किया गया। इसके बावजूद दोषियों द्वारा न तो अपनी गलती स्वीकार की गई और न ही पश्चाताप प्रकट किया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा शासन में न्याय की कोई संभावना नहीं है।
शंकराचार्य ने कहा कि प्रयागराज में 11 दिनों तक संयमपूर्वक रहकर दोषियों को आत्मसुधार का अवसर दिया गया था, लेकिन उन्होंने इसका लाभ नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि अपराध सबके सामने आ चुका है, अब उसे नकारने का कोई औचित्य नहीं बचता। इसके बाद संत समाज काशी लौट आया, जिससे यह संदेश गया कि इस सरकार से न्याय की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
यूजीसी के नए नियमों पर शंकराचार्य ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि यह नियम जानबूझकर इस उद्देश्य से लाए गए हैं ताकि सनातन धर्म की मूल व्यवस्था को कमजोर किया जा सके। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में जाति व्यवस्था समाज को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि आजीविका और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए बनाई गई थी।

उन्होंने आरोप लगाया कि यूजीसी के माध्यम से एक जाति को दूसरी जाति के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है, जिससे हिंदू समाज में आपसी संघर्ष बढ़ेगा। यह पूरी प्रक्रिया सनातन धर्म को समाप्त करने की साजिश का हिस्सा है।
शंकराचार्य के बयान के बाद काशी के विभिन्न मठों और अखाड़ों से जुड़े संत-महंतों में भी रोष देखा गया। कई संतों ने बटुक अपमान की घटना की निंदा करते हुए कहा कि यदि दोषियों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो संत समाज आंदोलन के लिए बाध्य होगा।
संतों ने संकेत दिए कि आगामी दिनों में यूजीसी नियमों और बटुक अपमान प्रकरण को लेकर देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाया जा सकता है। इस मुद्दे पर धर्माचार्यों की आपात बैठक बुलाने की भी चर्चा है। उल्लेखनीय है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बुधवार की रात करीब साढ़े नौ बजे केदार घाट स्थित श्रीविद्या मठ पहुंचे। माघी पूर्णिमा के अवसर पर उन्होंने गंगा स्नान नहीं किया। उनकी सुरक्षा को लेकर भेलूपुर थाना पुलिस पूरी तरह सतर्क रही और मठ परिसर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात रहा।









