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दर्स – ए- शाबान पुरखों की कब्र पर अकीदत का चरागा घरों में फातिहाख्वानी दरगाहों पर उमङा हुजूम

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दर्स – ए- शाबान पुरखों की कब्र पर अकीदत का चरागा
घरों में फातिहाख्वानी दरगाहों पर उमङा हुजूम
काशी। शब-ए-वरात की रात एक नूरानी रात में सराबोर रही। पुरखों की मजारों पर अकीदत का चरागा किया गया । घरों में फातिहा और नियाज से आकीदत पेश की गई। शहर के विभिन्न शाह और शहीदों के दरबार में भी फातिहाख्वानी से अकीदत की पेश अदायगी का सिलसिला रात भर चलता रहा । मस्जिदों में नफली नमाजों के साथ तकरीरे भी होती रही।
अस्र की नमाज के बाद घरों मे पूरखों के नाम से की गई फातिहाख्वानी में लजीज व्यंजनों संग कई तरह के विशिष्ट और स्वादिष्ट हलुआ व शिरनी पर नियाज कराई गई। घर भी रोशन आफताब रहे। इसके बाद कब्रिस्तान और दरगाहों की ओर रवाना होते रहे। लाटशाही, कुतबन शहुतबनबहादर शहीद, रहीमशाह, शाह तेयब बनारसी, याकूब शहीद, बहादर शहीद, धुलाकी शहीद, बाबा फरीद कुतुबतुबरसी, खाकीशाह, मलंग शाह, कमाल शाह , जुम्मा शाह ज्ञानी, वगैरह आस्तानों पर फातिहाख्वानी का सिलसिला देर रात तक चलता रहा। इस मौके पर कई मस्जिदों में “दर्स-ए-शाबान ” पर उलेमाओं ने रोशनी डाली। फजिलत और अहमियत रोशनी डालते हुए कहा कि इस्लामी कैलेंडर के शाबान महीने की अहम कङी यह है कि यह महीना मुकद्दस और रहमत व बरकत वाले रमजान माह की दावत देता है। यही नहीं शाबान महीने की एक ऐसी रात अल्लाह ने अपने बंदो को तोहफे में अता की है जिसे मगफिरत की रात कहा जाता है। यह वह रात है अल्लाह सातवें आसमान से फरमाता है , है कोई अपनी गुनाहों से निजात मांगने वाला, रोजी मांगने वाला, सेहत और तंदुरुस्ती मांगने वाला, जिसे मैं बख्श दूं ।

(एम.नसीम की कलम से)

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