क्या दत्तात्रेय इस्लामी धारणा से अनभिज्ञ ?
एम . नसीम
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इस्लाम धर्म की बुनियाद ही जब एक ही ईश्वर की है तो बार-बार बहु ईश की उपासना करने वाले बयान और धारणाऐं क्यों बहाये जाने के सवाल उठाये जाते हैं। नासमझ यदि इस बात को उठाते हैं तो यह समझा जा सकता है कि वह अनभिज्ञ है अथवा जानकारी का अभाव है, लेकिन जब समझदार और ज्ञानी व्यक्ति इस तरह की किसी धर्म के विपरीत धारणा या विचार व्यक्त करे तो यह सीधे-सीधे उस समाज ही नहीं उसके धर्म पर भी सीथा वार महसूस होता है। यही कार्य आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने किया है। जबकि वह जानते है कि इस्लाम की अवधारणा ही एकेश्वरवाद पर ही आधारित है।

बकौल होसबोले ” यदि मुस्लिम पर्यावरण की दृष्टि से नदी की पूजा करें और सूर्य नमस्कार करें तो इसमें क्या हर्ज है ” । तो इसका जवाब ये है कि अल्लाह ने ही इन्सान के लिए सूरज और नदी को बनाया है। यानी यह कुदरत की निशानियों में है। इसके लिए मुसलमान इनके ऐहतराम के साथ ही अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। जमीन- आसमान ही नहीं पाताल तक की रब थाह रखता है। मुसलमान ऐसे ईश्वर पर ईमान रखते हैं। एक सबसे दिलचस्प उदाहरण यह भी है कि नये संसद भवन के आगाज के समय विधिविधान के साथ भारत की लोकतांत्रिक गरेमा को बरकरार रखने के लिए कराये गये धर्म पाठ में मुस्लिम समाज की ओर से पेश किये गये कुरान शरीफ के उच्चारम में उलेमा ने ” सुरह रहमान ” का उच्चारण किया था। रहमान अरबी भाषा का शब्द है। अल्लाह शब्द का पर्यायवाची है। इस्लामी ग्रंथ के 27 वें पारे यानी भाग का यह अध्याय है । इसकी हर एक पंक्ति आपके सवाल का जवाब बतौर उदाहरण है। यह कार्य भी अब कठिन नहीं रहा । अब तो इस्लाम धर्म का यह मुख्य ग्रंथ हिन्दी और अंग्रजी समेत कई अन्य भाषाओं में बतौर अनुवाद उपलब्ध है। कृपया अपने जवाब इसी में तलाशें तो विस्तार पूर्वक उदाहरण के साथ अवलोकन कर सकते हैं।









