काशी। आस्था और श्रद्धा के केंद्रों पर प्रहार करने वालों पर सख्त नियंत्रण आवश्यक है। वेदों में स्पष्ट कहा गया है— “शठे शाठ्यम् समाचरेत”, अर्थात दुष्ट के साथ कठोरता ही उचित आचरण है। यह उद्गार सुमेरु पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी ने काशी दक्षिण भाग के गंगानगर स्थित शिवपुरी कॉलोनी में सकल हिंदू समाज द्वारा आयोजित हिंदू सम्मेलन को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित इस सम्मेलन में शंकराचार्य जी ने कहा कि जब-जब भारतीय समाज पर आक्रांताओं का प्रभाव बढ़ा है, तब-तब किसी न किसी महापुरुष ने उसका सशक्त प्रतिकार किया है। उन्होंने शहीदी सप्ताह के अंतर्गत गुरु गोविंद सिंह जी के चारों साहिबजादों के अद्वितीय बलिदान का स्मरण करते हुए युवाओं से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। महामना मदन मोहन मालवीय के योगदान का उल्लेख करते हुए शंकराचार्य जी ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रमों में श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, महाभारत तथा राष्ट्रनायकों के जीवन चरित्र को शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू समाज के संगठित होने से ही कश्मीर को अनुच्छेद 370 से मुक्ति मिली और श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण संभव हो सका। पांच परिवर्तन के संदर्भ में उन्होंने स्वदेशी, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता और मातृशक्ति की सुरक्षा को राष्ट्र निर्माण के लिए अनिवार्य बताया। कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती एवं वंदे मातरम् के सामूहिक गायन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन सुनीलकिशोर ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन राजेश पाठक ने प्रस्तुत किया। सम्मेलन में प्रमुख रूप से पंकज शुक्ला, चक्रपाणि भट्ट, रामाज्ञा पांडेय, डॉ. विजय कपूर, बृज मोहन वर्मा, बृजेश पाठक, श्रीकांत पांडे, तनुश्री राय, आशुतोष, ऋतिक, मनोज चौबे, पुष्पा पाठक, पुष्पलता, इंदु यादव, डॉ. मंजू द्विवेदी, प्रियंका पाठक सहित बड़ी संख्या में नागरिक बंधु एवं मातृशक्ति उपस्थित रहीं।









