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अतुल्य काशी को रंगों में नमन: वेद जी की स्मृति में कला, संवेदना और सृजन का संगम 

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वाराणसी। अभ्युदय संस्थान एवं आर्टिस्ट्री ऑफ़ वूमेन के संयुक्त तत्वावधान में काशी के ख्यातिलब्ध कलाकार स्वर्गीय वेद प्रकाश मिश्र जी की स्मृति को समर्पित परिचर्चा सह चित्रकला कार्यशाला एवं प्रतियोगिता में निर्मित कृतियों की भव्य चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन अस्सी स्थित क्यूरिटिका फाउंडेशन एवं आर्ट गैलरी में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। यह प्रदर्शनी कला प्रेमियों के अवलोकनार्थ 10 एवं 11 जनवरी को खुली रही।

 

उल्लेखनीय है कि दिनांक 28 दिसम्बर 2025 को नागरी नाटक मण्डली, वाराणसी में आयोजित “वेद जी एवं अतुल्य काशी” विषयक परिचर्चा सह चित्रकला कार्यशाला एवं प्रतियोगिता में काशी की आत्मा, उसकी संस्कृति और

 

संवेदना को कलाकारों ने रंगों में ढालने का सार्थक प्रयास किया था। उन्हीं कृतियों को इस प्रदर्शनी के माध्यम से कला प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। प्रदर्शनी का उद्घाटन डॉ० सुनील कुमार विश्वकर्मा, प्रो० मनीष अरोड़ा, डॉ० सुनील कुमार सिंह कुशवाहा, डॉ० शारदा सिंह एवं वनिता मिधा द्वारा दीप प्रज्वलन तथा स्वर्गीय वेद प्रकाश मिश्र जी के चित्र पर माल्यार्पण कर किया गया। इस अवसर पर डॉ० शारदा सिंह (सचिव, अभ्युदय संस्थान/संस्थापिका एवं अध्यक्ष, आर्टिस्ट्री ऑफ़ वूमेन तथा सीईओ, काशी जूट इंडस्ट्रीज प्रा. लि.) एवं वनिता मिधा ने मंचस्थ अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ एवं अंगवस्त्र भेंट कर किया। प्रदर्शनी में 162 प्रतिभाशाली कलाकारों द्वारा निर्मित चित्रों को प्रदर्शित किया गया है, जिनमें काशी की परंपरा, लोकजीवन, आध्यात्मिक चेतना और समकालीन संवेदनाओं की सजीव झलक देखने को मिलती है। प्रदर्शनी के दूसरे दिन डॉ० शमशेर सिंह (हृदय रोग विशेषज्ञ), सुमित घोष, राजेश्वर सिंह राणा एवं योगेश अग्रवाल ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कर कला का उत्साहवर्धन किया। इस अवसर पर श्री अजय उपासनी, डॉ० सुजीत कुमार चौबे, क्यूरिटिका आर्ट गैलरी के सचिव डॉ० शशिकांत नाग, राणाजी मूवमेंट सभागार के ट्रस्टी राणा शेरू सिंह, ब्रजराज त्रिपाठी, सुनीता सिंह, सीमा पाठक, शिवानी कुमारी, कुमारी कुसुम, सुप्रिया विश्वकर्मा, अर्चना विश्वकर्मा, पल्लवी यादव, प्रीति वर्मा, कुणाल विश्वकर्मा सहित बड़ी संख्या में कला प्रेमी उपस्थित रहे। यह प्रदर्शनी न केवल स्वर्गीय वेद प्रकाश मिश्र जी को सृजनात्मक श्रद्धांजलि है, बल्कि काशी की जीवंत कला परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम भी सिद्ध हुई।

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